शुभम सोनी संपादकीय लेख । मेरठ के ब्रह्मपुरी सर्किल से निकला 29 सेकंड का ऑडियो अब 29 सवाल बन चुका है। सौम्या अस्थाना की आवाज़ में साफ निर्देश—थाने के भीतर वीडियोग्राफी करो, तो मुकदमा झेलो। बाद में अविनाश पांडेय का स्पष्टीकरण—“यह आदेश पोर्टल वालों के लिए था।” लेकिन जनता पूछ रही है: क्या संविधान भी अब प्लेटफॉर्म देखकर अधिकार देगा?
तुगलकी तेवर क्यों?
थाना कोई निजी दफ्तर नहीं, राज्य की सार्वजनिक संस्था है। हाँ, संवेदनशील क्षेत्र हो सकते हैं, जाँच प्रभावित न हो—यह भी ज़रूरी है। पर सवाल यह है कि क्या हर कैमरा “सरकारी काम में बाधा” है? अगर ऐसा है, तो पारदर्शिता का क्या अर्थ रह जाता है?
लोकतंत्र में कैमरा दुश्मन नहीं होता—कभी-कभी वही सबसे बड़ा गवाह होता है।
डर किस बात का?
ऑडियो में जो जल्दबाज़ी और कठोरता सुनाई देती है, वह अनुशासन से अधिक असहजता का संकेत देती है। अगर कामकाज दुरुस्त है, प्रक्रिया साफ़ है, तो रिकॉर्डिंग से भय कैसा?
सख़्ती प्रशासन का अधिकार है, लेकिन असहिष्णुता उसकी कमजोरी। आदेश जितना कठोर होगा, उतना ही यह संदेह गहराएगा कि कहीं सवालों से बचने की कोशिश तो नहीं?
“पोर्टल वाले” अलग कैसे?
यह तर्क कि आदेश “पोर्टल वालों” के लिए था, अपने आप में भेदभाव की गंध देता है। आज डिजिटल मीडिया सूचना-तंत्र का अनिवार्य हिस्सा है। पत्रकारिता का मूल्य उसके माध्यम से नहीं, उसके आचरण से तय होता है।
अगर कोई पत्रकार सीमा लांघे, कानून मौजूद है। पर blanket आदेश? यह न्याय से अधिक नियंत्रण का संकेत देता है।
सरकार के लिए आईना
सरकारें अक्सर पारदर्शिता की बात करती हैं—“सुशासन”, “जीरो टॉलरेंस”, “खुलापन।” पर ज़मीनी स्तर पर यदि पत्रकारों पर मुकदमे की तलवार लटकाई जाएगी, तो संदेश उल्टा जाएगा।
प्रशासन को समझना होगा:
संवाद रोकने से विवाद बढ़ता है।
कैमरा बंद कराने से भरोसा नहीं बनता।
डर से नहीं, विश्वास से शासन चलता है।
मीडिया भी बरी नहीं
यह भी सच है कि कुछ पोर्टल और तथाकथित पत्रकारिता ने मर्यादा तोड़ी है—ब्लैकमेलिंग, सनसनी, आधी-अधूरी जानकारी। लेकिन चंद उदाहरणों की आड़ में पूरे समुदाय को कठघरे में खड़ा करना न्याय नहीं।
गलत को दंडित कीजिए, सबको नहीं।




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