“एक कुआँ, बारह जवान और हजार सवाल“फोटो में वीरता, जमीन पर वीरानगी नाक बची या जंगल कटा?”

लटेरी। लटेरी के जंगलों में इन दिनों “वीरता” की ऐसी पटकथा लिखी जा रही है कि अगर सूखे ठूंठों में भी जान होती, तो वे भी ताली बजाकर कहते—वाह रे प्रबंधन!
 हेमंत यादव के निर्देशन में वन विभाग ने अतिक्रमण के विरुद्ध सख्त रुख अपनाते हुए दक्षिण लटेरी परिक्षेत्र, भोपाल उड़नदस्ता दल और स्थानीय स्टाफ के साथ बीट तिंसिया, कंपार्टमेंट P-449 में संयुक्त दबिश दी। अभियान ऐसा कि मानो सीमाओं पर ऑपरेशन चल रहा हो।

परिणाम—एक बुजुर्ग अतिक्रमणकारी रंगे हाथों पकड़ा गया। आरोप है कि वह वन भूमि में कुआँ खोद रहा था और झाड़ियाँ साफ कर रहा था। घटनास्थल से कुल्हाड़ी, सब्बल, फावड़ा और तसला जब्त किए गए। फोटो में 12 वन जवान सीना ताने खड़े दिखाई दिए—बीच में अधिकारी महोदय विजयी भाव से दमकते हुए। जैसे दशकों से जंगलों का सीना चीरने वाला कोई कुख्यात सरगना धर दबोचा गया हो और विभाग की साख एक झटके में बचा ली गई हो।
अब ज़रा तस्वीर का दूसरा फ्रेम भी देख लीजिए। कोसों दूर तक हरियाली ढूंढते रह जाइए—जंगलों की छाती पर जगह-जगह घाव नजर आते हैं। पेड़ों की जगह सूखी जमीन, लकड़ी के ढेर और खामोशी की चादर। स्थानीय लोग दबी जुबान में कहते हैं कि कुल्हाड़ी सिर्फ एक हाथ में नहीं होती; कुछ हाथ ऐसे भी हैं जो दिखते कम और चलते ज्यादा हैं। अगर सचमुच हरे-भरे जंगल उजड़ रहे हैं, तो सवाल यह है कि इतनी चौकसी के बावजूद हरियाली कहाँ गुम हो गई?
भोपाल से जिले तक का अमला एक बुजुर्ग को पकड़ने में जुट जाए—इसे तत्परता कहें या प्राथमिकताओं का अद्भुत संतुलन? बड़े-बड़े नाम, बड़े-बड़े खेल, बड़े-बड़े ट्रक—वे सब अक्सर हवा में घुल जाते हैं। मगर कैमरे के सामने एक बुजुर्ग की गिरफ्तारी विभागीय “सफलता” का पोस्टर बन जाती है। क्या जंगल फोटो से बचते हैं या जमीनी निगरानी से? क्या साख प्रेस नोट से बनती है या पेड़ों की छाया से? यदि सफलता का पैमाना एक आसान गिरफ्तारी है, तो नाक भले बच जाए, पर जंगल की सांसें कौन बचाएगा?

जंगल आज भी खड़े हैं—चुपचाप, गवाह बनकर। वे शायद यही इंतजार कर रहे हैं कि कभी कोई दबिश हरियाली के पक्ष में भी उतनी ही सख्ती से पड़े, जितनी कैमरे के सामने पड़ी थी।

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