शासन की योजना, प्रशासन की लापरवाही: किसानों और उपभोक्ताओं के लिए शुरू हुई हेल्पलाइन खुद मदद की मोहताज

भोपाल। दुग्ध उत्पादकों और उपभोक्ताओं की समस्याओं के त्वरित समाधान के उद्देश्य से शुरू की गई साँची मिल्क हेल्पलाइन अब सवालों के घेरे में है। जनसंपर्क विभाग की खबर के अनुसार इस टोल-फ्री नंबर की शुरुआत 24 फरवरी 2022 को की गई थी, लेकिन वर्तमान में इस नंबर पर कॉल करने पर यह बंद अथवा इनवेलिड बताया जा रहा है। इससे सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर साफ नजर आ रहा है।

जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी जानकारी के अनुसार अपर मुख्य सचिव, पशुपालन एवं डेयरी श्री जे.एन. कंसोटिया ने प्रदेश के दुग्ध संघों से जुड़े दुग्ध उत्पादक किसानों और उपभोक्ताओं के लिए एकीकृत कॉल-सेंटर “साँची मिल्क हेल्पलाइन” का शुभारंभ किया था। शिकायत दर्ज कराने के लिए 0755-4355800 नंबर जारी किया गया था, जिस पर सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक दो पालियों में शिकायतें दर्ज किए जाने का दावा किया गया था।

एम.पी. स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन के तत्कालीन प्रबंध संचालक श्री शमीम उद्दीन ने कहा था कि इस हेल्पलाइन से दुग्ध संघों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आएगी और समिति सदस्यों, उपभोक्ताओं व साँची से जुड़े लोगों की समस्याओं का त्वरित और प्रभावी निराकरण संभव होगा।

हेल्पलाइन के माध्यम से दूध और दुग्ध उत्पादों की उपलब्धता, गुणवत्ता, पार्लर संबंधी समस्याएं, दुग्ध सहकारी समितियों के सदस्यों के भुगतान, फैट व एसएनएफ अंकन में त्रुटि, दूध की दर, पशु आहार की उपलब्धता, प्रशिक्षण, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का रख-रखाव, टैंकर संचालन और बल्क मिल्क कूलर जैसी समस्याओं के समाधान का भरोसा दिलाया गया था।

लेकिन वर्तमान स्थिति इसके विपरीत है। उपभोक्ताओं और दुग्ध उत्पादकों का कहना है कि जनसंपर्क विभाग द्वारा बताए गए नंबर पर कॉल करने पर शिकायत दर्ज होने के बजाय “गलत/इनवेलिड नंबर” की सूचना मिलती है। इससे न केवल शिकायतें दर्ज नहीं हो पा रहीं, बल्कि प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

वर्तमान में शासन स्तर पर दूध उत्पादन बढ़ाने, आम नागरिकों तक दूध की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने और किसानों के लिए दुग्ध व्यवसाय को लाभ का धंधा बनाने के उद्देश्य से कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। हालांकि, इन योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर पर कम और कागजों में ही अधिक नजर आ रहा है। साँची मिल्क हेल्पलाइन का बंद या इनवेलिड होना इसी व्यवस्था की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

अब बड़ा सवाल यह है कि
क्या टोल-फ्री नंबर बंद कर दिया गया है?
यदि नंबर बदला गया है तो नई जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
और यदि नहीं, तो इस तकनीकी या प्रशासनिक खामी का समाधान कब होगा?

जब तक इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, तब तक शासन की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और साँची मिल्क हेल्पलाइन की उपयोगिता दोनों ही संदेह के दायरे में बनी रहेंगी।


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