लटेरी वन परिक्षेत्र में लकड़ी माफिया बेलगाम — वन विभाग बना ‘मूक दर्शक’

लटेरी वन परिक्षेत्र में लकड़ी तस्करी का काला खेल — रात के अंधेरे में ट्रॉली, विभाग दिन निकलते ही गायब
छह महीने से डिपो में एक तिनका तक नहीं, और अब अचानक ‘जलाऊ लकड़ी’ के नाम पर ट्रॉलियां!

लटेरी/विदिशा।
लटेरी वन परिक्षेत्र में लकड़ी तस्करी का खेल अब खुलेआम और बेखौफ चल रहा है। सबसे बड़ा सवाल—लकड़ी हमेशा रात के अंधेरे में ही क्यों लाई जाती है? अगर सब कुछ वैधानिक है, तो विभाग दिन में क्यों नहीं दिखाता? और परिवहन पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?

रात के समय ट्रैक्टर–ट्रॉली और बैलगाड़ियों से लकड़ी की ढुलाई एक तय रूटीन बन चुकी है। न कोई जांच, न कोई परमिट, न रवानगी की रसीद। जबकि दिन निकलते ही विभाग के अधिकारी और स्टाफ ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे मामला उनसे जुड़ा ही न हो।

मीडिया टीम द्वारा पकड़ी गई ट्रॉली के पास कोई भी कागज़ नहीं मिला। पूछने पर अधिकारी संजय मीना ने सफाई दी—“जलाऊ लकड़ी है, उसकी रसीद नहीं बनती… डिपो में खाली होना था…”
लेकिन विभाग की यह दलील उसी वक्त ध्वस्त हो गई जब डिपो के चौकीदार ने ही बड़ा खुलासा कर दिया।

चौकीदार के अनुसार—
“पिछले छह महीनों से डिपो में एक भी जलाऊ लकड़ी नहीं आई… और आज अचानक जलाऊ लकड़ी आ गई? यह तो पहली बार दिख रही है!”

चौकीदार का यह बयान विभाग की कहानी पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अगर 6 महीने में लकड़ी डिपो में आई ही नहीं, तो यह ट्रॉलियां आखिर किस ‘शासकीय कार्य’ के नाम पर जंगल से बाहर निकाली जा रही थीं?

चालक ने भी सबके सामने स्वीकार किया कि सागौन की लकड़ी प्राइवेट ट्रॉली में भरकर लाई जाती है और अक्सर लाई जाती है। पीछे से दो और ट्रॉलियां आने की बात भी उसी ने बताई, जिनके पास न परमिशन, न कोई वैध दस्तावेज था।

सबसे बड़ी विडंबना—
रात में ट्रॉली पकड़कर डिपो में खाली कराई गई और ट्रॉली चालक ने मीडिया को चुनौती देते हुए कहा—
“तुम जैसे बहुत पत्रकार देखे हैं… हम फिर लकड़ी भर लाएंगे!”

यह बयान न केवल विभाग की कमजोरी उजागर करता है, बल्कि बताता है कि जंगल पर लकड़ी माफियाओं का कब्जा है और वन विभाग सिर्फ कागज़ी कार्यवाही में व्यस्त दिखता है।

लटेरी वन परिक्षेत्र में हो रही यह खुली लूट सवाल खड़े कर रही है—
क्या रात में लकड़ी लाने का मतलब किसी बड़े खेल को छिपाना है? 
अगर सब वैधानिक है, तो दिन में क्यों नहीं? छह महीने से डिपो में लकड़ी नहीं, फिर अचानक यह जलाऊ लकड़ी कहां से आ गई और कार्रवाई आखिर कब होगी? 
जंगल लुट रहे हैं, ट्रॉलियां दौड़ रही हैं, और वन विभाग केवल सफाई दे रहा है। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो लटेरी का हरा–भरा जंगल सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगा।


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ