बदनामी का तिलक या खबर का बदला? क्या पत्रकारिता का अपराध अब सच बोलना हो गया है?

Flowers in Chania
 संपादकीय

बदनामी का तिलक या खबर का बदला?

क्या पत्रकारिता का अपराध अब सच बोलना हो गया है?

राजस्थान पुलिस द्वारा भोपाल के दो पत्रकारों को ब्लैकमेलिंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया। आरोप गंभीर हैं, लेकिन साक्ष्य कहाँ हैं? यह सवाल पत्रकारिता के हर जिम्मेदार नागरिक को विचलित कर रहा है।

अगर ब्लैकमेल के प्रमाण होते, तो क्या वे अब तक सार्वजनिक नहीं होते? आज का दौर सोशल मीडिया का है — जहां कोई भी ‘साक्ष्य’ पलभर में वायरल हो सकता है। फिर यह चुप्पी क्यों?

यह मामला केवल दो पत्रकारों की गिरफ्तारी का नहीं है। यह मामला उस पूरी व्यवस्था का है जो पत्रकारिता की रीढ़ तोड़ना चाहती है — ताकि सवाल पूछने की परंपरा ही खत्म हो जाए।

कानून सत्ता के लिए लचीला, पत्रकारों के लिए कठोर

अफसरों पर अपराध दर्ज हों, तो विभागीय जांच, लंबी प्रक्रिया और सफाई का मौका मिलता है।
पर पत्रकार? सीधे अपराधी करार।
क्यों? क्योंकि उसने सवाल किया, खबर दिखाई, सच बोला।

जब सत्ता को आइना दिखाने की हिम्मत रखने वाला व्यक्ति सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है, तो लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है।
कानून सबके लिए समान होना चाहिए, लेकिन जब वही कानून सत्ता के लिए ढाल और पत्रकार के लिए तलवार बन जाए — तब लोकतंत्र खोखला हो जाता है।

साक्ष्य नहीं, सत्ता की सनक

कोई नहीं पूछ रहा कि पत्रकारों ने कौन-सी खबर चलाई?
क्या वे खबरें झूठी थीं?
क्या उन खबरों का खंडन जारी हुआ?
नहीं।
सिर्फ यह कहा गया — “ब्लैकमेल किया गया।”

अगर वाकई ब्लैकमेलिंग होती, तो साक्ष्य होते, ऑडियो-वीडियो होते, लेन-देन होता।
पर यहाँ तो सबूत की जगह आरोप हैं और जवाब की जगह चुप्पी।

 पत्रकारिता की आत्मघाती प्रवृत्ति

सबसे दुखद यह है कि पत्रकार ही पत्रकारों के खिलाफ खड़े हो गए हैं।
बिना तथ्यों के, बिना जांच के, अपने ही साथियों को दोषी बताना — यह पत्रकारिता नहीं, गिरावट है।

नेता कभी अपने साथी का विरोध खुलकर नहीं करते। अफसर अपने अफसर की ढाल बनते हैं।
पर पत्रकार — अपने ही बिरादरी के लोगों पर सबसे पहले वार करता है।
क्या यही है वह चौथा स्तंभ, जिस पर लोकतंत्र की इमारत खड़ी है?

 सत्ता का अहंकार और प्रेस की चुप्पी

आज नेता सत्ता में आते ही राजा बन जाते हैं।
सवाल उठाओ — तो दुश्मन।
खबर दिखाओ — तो ब्लैकमेलर।
विरोध करो — तो “विपक्ष का एजेंट”।

कभी सत्ता की गलियों में सच कहने का साहस लोकतंत्र की पहचान था।
अब वही साहस गिरफ्तारी का कारण बन रहा है।
क्या यही आज़ादी है, जिसके लिए प्रेस ने हमेशा संघर्ष किया?

 मीडिया को तोड़ने का नहीं, मजबूत करने का समय

मीडिया ही वह ताकत है जिसने सत्ता को जवाबदेह रखा, जनता को जानकारी दी और लोकतंत्र को जीवित रखा।
सुप्रीम कोर्ट के जजों ने भी जब न्याय की बात जनता से करनी चाही, तो उन्होंने मीडिया का दरवाज़ा खटखटाया।
वही मीडिया आज डर के साए में खामोश हो जाए — तो फिर जनता की आवाज़ कौन बनेगा?

पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई से पहले साक्ष्य जनता के सामने रखे जाएँ।
अगर अपराध है — तो प्रमाण दिखाइए।
अगर प्रमाण नहीं हैं — तो यह सत्ता का प्रतिशोध है।

प्रेस पर हमला, लोकतंत्र पर वार

यह घटना चेतावनी है कि अब पत्रकारिता का अपराध सच बोलना बन गया है।
बदनामी का तिलक लगाना आसान है, लेकिन इतिहास गवाह है — सत्ताएं बदलती हैं, सच नहीं।

आज जिन पर ब्लैकमेल का ठप्पा लगाया जा रहा है,
कल वही पत्रकार न्याय का प्रतीक बनेंगे।
क्योंकि पत्रकारिता को झुकाया जा सकता है, हराया नहीं जा सकता।

जब पत्रकारों पर आरोप लगे हों, तब पत्रकारों को ही सबसे पहले साक्ष्य माँगने चाहिए, न कि सत्ता की भाषा बोलनी चाहिए।
क्योंकि आज अगर किसी और को “ब्लैकमेलर” कहा गया है,
तो कल तुम्हें “एंटी-नेशनल” कहा जाएगा।

बदनामी का तिलक तो लगा ही दिया गया है —
बस डर यही है कि कहीं सच बोलना ही अपराध न बन जाए।

✍️ – शुभम सोनी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख लेखक के निजी विचार है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ