पत्थरों के बीच दबती आस्था—क्या यही है सहिष्णु भारत?


संपादकीय 

शुभम सोनी विदिशा 
गुना से उठे सवाल, पूरे देश के ज़मीर को झकझोरते हैं — कब तक सहता रहेगा हिंदू समाज? कब होगा आत्मसम्मान का पुनर्जागरण?

हनुमान जयंती का उत्सव, जिसे आराधना और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है, आज शांति का नहीं, अशांति का प्रतीक बनता जा रहा है।
गुना की घटना कोई अपवाद नहीं, यह एक चलन बन चुका है—जहाँ हर बार बहुसंख्यक परंपरा को ही "उकसाने वाला" घोषित कर दिया जाता है।

कर्नलगंज की मस्जिद के पास अचानक हुए पथराव ने सिर्फ जुलूस को नहीं रोका, बल्कि एक समुदाय की आत्मा को भी ठेस पहुंचाई।
और जब पत्थर हवा में उड़ते हैं, तो सिर्फ शीशे नहीं टूटते—टूटता है भरोसा, टूटती है संवैधानिक समानता, और टूटती है वह चुप्पी, जो अब गूंज में बदल रही है।

कलेक्टर आए, पुलिस आई, सुरक्षा बढ़ाई गई—लेकिन क्या सुरक्षा सिर्फ एक घटना के बाद दी जाएगी?
या कभी पहले से सोचा जाएगा कि बहुसंख्यक की धार्मिक स्वतंत्रता भी कोई मायने रखती है?

बंगाल से लेकर केरल, और अब मध्यप्रदेश तक, घटनाएं एक ही पैटर्न पर घट रही हैं—त्योहार मनाने निकले हिंदू, और फिर अचानक हिंसा, पथराव, पत्थरबाज़ी, सोशल मीडिया पर नफ़रत और मुख्यधारा मीडिया की चुप्पी। सवाल सिर्फ एक त्योहार या एक जिले का नहीं है, सवाल है पूरे देश की आत्मा का। आखिर कब तक हिंदू समाज सहन करेगा? क्या बहुसंख्यक होना ही अब अपराध बन गया है?

भारत, जो विश्व में अपनी सांस्कृतिक विविधता और सहिष्णुता के लिए जाना जाता था, अब धीरे-धीरे उस राह से भटकता प्रतीत हो रहा है। जब भी हिंदू समाज अपनी परंपराओं का पालन करना चाहता है, तब उसे "उकसाने वाला" या "असहिष्णु" बता दिया जाता है। क्या सहिष्णुता की परिभाषा सिर्फ एकतरफा हो गई है?

हिंदू राष्ट्र—यह शब्द किसी के लिए राजनीति हो सकता है, किसी के लिए भय, लेकिन बहुतों के लिए यह केवल अपने अस्तित्व और सम्मान की रक्षा की भावना है। यह मांग शासन की नहीं, बल्कि आत्मगौरव की है। यदि एक देश में बहुसंख्यक समुदाय अपने धार्मिक त्योहार शांति से नहीं मना सकता, तो उसे विचार करना ही होगा—क्या वह वास्तव में स्वतंत्र है?
अब समय है मौन से आंदोलन की ओर बढ़ने का।
अब समय है हिंदू समाज के आत्मगौरव को पुनः जीवित करने का।
अब समय है यह पूछने का—क्या बहुसंख्यक अपने ही देश में अल्पसंख्यक जैसी स्थिति में जीने को मजबूर है?

यह लेख किसी नफरत को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं है, बल्कि एक आह्वान है—सत्ता से, समाज से और स्वयं हिंदू समाज से—कि अब समय आ गया है जब "शांत रहने" की नीति पर पुनर्विचार हो।
शांति तभी संभव है जब न्याय हो। और न्याय तभी होगा जब हर धर्म, हर व्यक्ति को समान रूप से सुना और समझा जाए।

भारत को हिंदू राष्ट्र कब घोषित किया जाएगा — यह सवाल अब सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं, एक सांस्कृतिक चेतना आत्मा की पुकार बनता जा रहा है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ