शुभम सोनी विदिशा
संपादकीय: आतंकवाद के खिलाफ अब निर्णायक युद्ध—पहलगाम की त्रासदी के बाद कोई माफी नहीं
भारत एक बार फिर खून के आंसू रो रहा है। पहलगाम की सुरम्य घाटियों में बहा यह खून केवल उन 27 निर्दोष पर्यटकों का नहीं है, जिनकी सांसें आतंक के गोलियों से थम गईं, बल्कि यह पूरे भारतवर्ष के धैर्य, शांति और सहनशीलता पर किया गया एक निर्मम प्रहार है। बैसरन घाटी, जहां पर्यटक प्राकृतिक सुंदरता की तलाश में जाते हैं, आज आतंकवाद की वीभत्सता का नमूना बन चुकी है। एक बार फिर यह साबित हो गया कि भारत में आतंक की यह लहर किसी धर्म, जाति या प्रदेश को नहीं देखती—यह बस मारती है, डर फैलाती है, और हमारी राष्ट्रीय चेतना को ललकारती है।
इस बार आतंकियों ने नई क्रूरता का प्रदर्शन किया—नाम पूछकर, धार्मिक पहचान जानकर हत्या की गई। यह केवल आतंक नहीं, बल्कि संगठित और सुनियोजित नरसंहार है। किसी धर्म या समुदाय को कलंकित करने की सोची-समझी कोशिश है। यूपी के शुभम द्विवेदी को इसलिए मारा गया क्योंकि उनका नाम ‘शुभम’ था। क्या यह केवल एक आतंकी हमला है? नहीं। यह एक विचारधारा का विस्तार है जो इस उपमहाद्वीप को अस्थिर करना चाहती है, जो सांप्रदायिक विष फैलाकर भारत को भीतर से तोड़ना चाहती है।
इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा के मोहरे ‘द रजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) ने ली है। यह नाम कोई नया नहीं है, बल्कि पाकिस्तान द्वारा संचालित आतंकी नेटवर्क का एक नया मुखौटा है। TRF वही करता है जो जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा करते आए हैं—भारत की जड़ों को खोदने का प्रयास। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के संरक्षण में पले ये संगठन बार-बार भारत की एकता को चुनौती देते आए हैं, और यह हमला उसी चुनौती का एक और चेहरा है।
लेकिन अब सवाल उठता है—हम कितनी बार शोक मनाएंगे? कितनी बार कैंडल मार्च निकालेंगे? कितनी बार “दुखद”, “कड़ी निंदा”, “जांच के आदेश” जैसे खोखले शब्दों का प्रयोग करेंगे?
अब वक़्त है—क्रिया का नहीं, प्रतिक्रिया का। अब वक्त है नीति का नहीं, प्रतिशोध का।
भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि हम केवल शांति की बात करने वाला राष्ट्र नहीं हैं, बल्कि हम अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर सीमा तक जा सकते हैं। अब समय आ गया है कि पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अलग-थलग किया जाए। जो देश आतंक को पालते हैं, उन्हें आर्थिक और कूटनीतिक रूप से इतना कमजोर कर दिया जाए कि उनकी रीढ़ झुक जाए। अब केवल LOC पर जवाबी कार्रवाई नहीं, बल्कि रणनीतिक आक्रमण की आवश्यकता है।
हमें यह भी देखना होगा कि हमारे सुरक्षा और खुफिया तंत्र में कहां चूक हो रही है। जब चार आतंकी—जिनमें से दो विदेशी थे—देश के भीतर घुसकर इतने बड़े हमले को अंजाम दे सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि हमारे सुरक्षा कवच में दरारें हैं। ऐसी चूकों के लिए केवल जांच समिति नहीं, जिम्मेदारी और जवाबदेही होनी चाहिए। नाकामी पर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी न दोहराई जाए।
इस हमले के बाद जो दृश्य सामने आए—डरे हुए पर्यटक, वर्दी में आए भारतीय जवानों को आतंकवादी समझकर रोती महिलाएं और बच्चे—यह भारत के लिए एक चेतावनी है। आतंकवादियों ने हमारी जनता और हमारी सेना के बीच विश्वास तोड़ने की साजिश की है। लेकिन इस देश की मिट्टी में जो भरोसे की जड़ें हैं, उन्हें कोई नहीं उखाड़ सकता—बशर्ते हम अब चुप न रहें।
प्रधानमंत्री का विदेश दौरा छोड़कर लौटना, गृहमंत्री का घाटी का दौरा और अंतरराष्ट्रीय समर्थन—ये सभी सकारात्मक कदम हैं, लेकिन निर्णायक कार्रवाई अब ज़मीन पर दिखनी चाहिए। अब आतंकी ठिकानों पर एक और सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, बल्कि बहुपरती और स्थायी रणनीति चाहिए। एक ऐसा प्रहार जो दुश्मन को सोचने पर मजबूर कर दे—कि भारत अब केवल सहनशील राष्ट्र नहीं, बल्कि एक प्रतिशोधी राष्ट्र भी है।
यह केवल सरकार की नहीं, हम सभी की जिम्मेदारी है—सिविल सोसाइटी, मीडिया, राजनीतिक दल, और आम जनता—कि हम इस मुद्दे को राजनीति का विषय नहीं, राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न मानें। आतंक के खिलाफ कोई भी समझौता देश के साथ धोखा होगा। और अगर हम अब भी मौन रहे, तो अगला निशाना कोई और पहलगाम, कोई और बस, कोई और स्कूल या तीर्थ स्थान हो सकता है।
हमारे लिए अब विकल्प केवल दो हैं—या तो हम डरकर जीते रहें, या साहस के साथ आतंकवाद का अंत करें।
पहलगाम के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल शोक नहीं—बल्कि प्रतिशोध होगा।
अब निंदा नहीं, अब नरसंहार का जवाब चाहिए—सीधा, कठोर और निर्णायक।
भारत अब टूटेगा नहीं, झुकेगा नहीं—अब हर हमले का एक करारा जवाब मिलेगा। और वो जवाब इतिहास में दर्ज होगा।




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