अनादि को स्वीकारे बिना व्यक्ति अनन्त को नही पा सकता मैथिलीशरण


अनादि को स्वीकारे बिना व्यक्ति अनन्त को नही पा सकता  मैथिलीशरण 

आनंदपुर अनादि को स्वीकारे | बिना व्यक्ति अनन्त को नही पा सकता । रामराज्य राम का है , उसमें वर्तमान में कुछ लोग जबरदस्ती पैर न डालें , राम इस देश के जन जन के हृदय में है , हमारी आस्था के केंद्र बिंदु है । यह बात मानस मर्मज्ञ पं मैथिलीशरण महाराज ने सदगुरू सेवा ट्रस्ट के हनुमान मंदिर परिसर में मानस की व्याख्या करते हुए कही । उन्होंने कहा कि त्रिवेणी में गंगा - यमुना तो दिखाई देती हैं पर सरस्वती के न दिखाई देने पर भी जो उन्हें मान लिया जाता है , वही हमारे धर्म का अनादि तत्व है । हमें अपनी साधना और पुरुषार्थ के द्वारा जो अर्जन हो उसे भगवान के चरणों में विसर्जन करना होगा । हनुमान जी भगवान के हर कार्य को अपना मानते हैं , लक्ष्मण जी प्रभु की सेवा को अपनी देह की सेवा की तरह करते हैं , भरत जी संसार की संपत्ति को भगवान की सम्पत्ति मानते हैं । मेरी माँ राम है , मेरे पिता राम हैं मेरे सखा भी दयालु श्रीरामचन्द्र जी ही है , मैं बस इतना ही जानता हूँ , और कुछ न मैं जानता हूँ , न ही जानने की इच्छा है । यह भाव बहुत जरूरी है । मैथिलीशरण महाराज ने कहा कि देशवासियों को अपने देश और अपनी सनातन परम्परा के प्रति इसी भावना से प्रेम करना होगा , समर्पण की इस भावना से रामराज्य बनता है । 
जिस प्रकार से अविवेकी व्यक्ति अपने शरीर की सेवा करता है , लक्ष्मण वैसी सेवा श्रीराम की करते हैं । वहीं अयोध्या के पास नंदीग्राम में रहकर भगवान की पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान करके भरत पादुकाओं से आज्ञा मांगकर अयोध्या का राजकाज चलाते हैं । बाहरी दृष्टि से पादुकाएं जड़ है और भरत चैतन्य है , लेकिन भक्त और भक्ति दृष्टि से भरत मानते हैं कि मैं जड़ हूँ , पादुका चैतन्य है । जिसकी मति जड़ में चैतन्य तत्त्व को देख ले वही चैतन्य है , जो पादुका को जड़ समझे वस्तुतःवही जड़ता है । पादुका में लकड़ी है यह सांसारिक दृष्टि है , पादुका में राम है यह हमारी सनातन और अनादि दृष्टि है , जो सबके पास नहीं होती है । 
धर्म , संस्कार , व्यवहार , नीति ,प्रीति , परमार्थ तथा स्वार्थ सबका निर्वहन केवल उसी अनादि को मानने से संभव होगा । भरत ने पादुका को नहीं साक्षात् श्रीराम को सिंहासन पर बैठाया और भरत की इसी चैतन्य दृष्टि के कारण चित्रकूट में भगवान श्रीराम भरत के साथ स्वयं लौटकर नहीं गये अपितु उन्होंने अपनी पादुका दे दीं । स्वामी मैथिलीशरण ने कहा कि संसार में लोग भगवान के पद में अपना पद डाल देते हैं तो अनर्थ हो जाता है , भरत ने भगवान के पद में अपना पद नहीं डाला । भरत ने भगवान की पादुका की सेवा की , तो रामराज्य बना , लक्ष्मण ने उन चरणों की सेवा की इसलिए रामराज्य बना और हनुमान जी को साक्षात् भगवान के चरण ही मिल गये इसलिए रामराज्य बना और यही हमारी अनादि परम्परा है जो अनन्त है ।

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