संपादकीय लेख शुभम सोनी । 30 अगस्त 2025 की रात शमशाबाद नगर में एक ऐसी घटना घटी जिसने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की वास्तविकता को फिर उजागर कर दिया। बरखेड़ा जागीर (गेदावर्री) निवासी ममता बंजारा का प्रसव अस्पताल की चौखट के बाहर होना इस बात का प्रतीक है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था कागज़ों पर जितनी सशक्त दिखाई देती है, जमीनी स्तर पर उतनी ही असहाय नज़र आती है।
तहसीलदार द्वारा किए गए आकस्मिक निरीक्षण में यह तथ्य सामने आया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बरखेड़ा जागीर में पाँच कर्मचारी पदस्थ हैं, किन्तु घटना के समय केंद्र पर ताला लटका हुआ था। प्रभारी चिकित्सा अधिकारी अनुपस्थित थे, और मात्र एक एएनएम अवकाश दिवस पर मौजूद पाई गईं। परिणामस्वरूप, एक गर्भवती महिला को नियमानुसार स्वास्थ्य सेवा न मिलने से सड़क पर ही प्रसव की पीड़ा सहनी पड़ी। यह स्थिति केवल संवेदनहीनता नहीं बल्कि लापरवाही की चरम सीमा है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने स्वयं स्वीकार किया कि अस्पताल बंद होने के कारण ममता बंजारा को मजबूरन शमशाबाद ले जाया गया और रास्ते में ही प्रसव हो गया। यह प्रश्न उठता है कि यदि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अवकाश के दिन बंद रहता है तो फिर "आपातकालीन चिकित्सा सुविधा" का क्या औचित्य है? स्वास्थ्य सेवाएं समय, तिथि और अवकाश की मोहताज नहीं हो सकतीं।
सरकार और प्रशासन द्वारा बार-बार यह दावा किया जाता है कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। योजनाओं के अंतर्गत जच्चा-बच्चा कार्ड, आयरन की गोलियाँ, टीकाकरण और 108 एम्बुलेंस जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। लेकिन जब जरूरत की घड़ी आती है, तो यह पूरी व्यवस्था बिखर जाती है। अगर बरख़ेड़ा जागीर का स्वास्थ्य केंद्र खुला होता, तो एक महिला और उसका परिवार इस असहनीय स्थिति से न गुजरता।
यह घटना केवल एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर प्रश्नचिह्न है। प्रशासन ने निरीक्षण कर पंचनामा बना लिया, निर्देश जारी कर दिए कि अवकाश दिवस पर भी ड्यूटी लगाई जाए। लेकिन क्या सिर्फ़ कागज़ी कार्यवाही से ऐसी घटनाएँ रुकेंगी? जवाब स्पष्ट है—नहीं।
अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही तय हो। यदि कोई केंद्र अनुपस्थित पाया जाता है तो केवल चेतावनी नहीं बल्कि कठोर कार्रवाई हो। साथ ही, ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में "24x7 आपात स्वास्थ्य केंद्र" सुनिश्चित करना अनिवार्य है। स्वास्थ्य कर्मचारी अपनी ड्यूटी को "नौकरी" नहीं बल्कि "सेवा" समझें।
ममता बंजारा के प्रसव की यह घटना हमें चेतावनी देती है कि यदि स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत नहीं सुधरी, तो “जनता के स्वास्थ्य का अधिकार” केवल घोषणाओं में ही सिमट कर रह जाएगा।
जनता को यह पूछने का हक है कि आखिर जनसेवा के इन मंदिरों पर ताले क्यों लगते हैं? और प्रशासन कब तक केवल औपचारिक कार्यवाहियों से अपनी जिम्मेदारी निभाता रहेगा?




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