सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन डबरियों का निर्माण किसके द्वारा—मशीन से या मजदूरों से—किया जा रहा है, इसकी जानकारी न तो क्षेत्रीय नाकेदार को है और न ही डिप्टी रेंजर को। जब इस विषय में कर्मचारियों से बात की गई, तो उन्होंने सीधा पल्ला झाड़ते हुए कहा कि इस विषय में "ऊपर के अधिकारियों" से संपर्क करें।
जानकारी का अभाव या जिम्मेदारी से बचाव?
वन विभाग के क्षेत्रीय अधिकारियों की इस असहज चुप्पी और जानकारी के अभाव से यह स्पष्ट होता है कि विभागीय स्तर पर संवादहीनता और लापरवाही का आलम है। ना तो स्थानीय अधिकारी मीडिया को जानकारी देना चाह रहे हैं, और ना ही वे स्वयं अपने क्षेत्र में हो रहे कार्यों की निगरानी कर रहे हैं।
वन भूमि पर बढ़ता अतिक्रमण, विभाग मौन
लटेरी क्षेत्र में वनों का क्षरण लगातार जारी है। वन भूमि पर अवैध रूप से तालाब, कुएं और ट्यूबवेल का निर्माण खुलेआम किया जा रहा है। इसके बावजूद वन विभाग की ओर से न तो कोई सख्त कार्रवाई की जा रही है और न ही इन गतिविधियों को रोकने का प्रयास। ऐसा प्रतीत होता है कि विभागीय कर्मचारी केवल कागजों में अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं और मैदान में उपस्थिति लगभग नगण्य है।
प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव
सरकार द्वारा समय-समय पर जल संरक्षण और वन सुरक्षा के लिए बजट और योजनाएं स्वीकृत की जाती हैं, लेकिन जब इन योजनाओं के क्रियान्वयन की बात आती है, तो जिम्मेदार अधिकारी मीडिया और जनता दोनों से दूरी बनाए रखते हैं।
यदि वन विभाग के अधिकारी ही अपने कार्यक्षेत्र में हो रहे निर्माण कार्यों की जानकारी से अनभिज्ञ रहेंगे, तो ऐसे में योजनाओं का सही संचालन और पर्यावरण संरक्षण की बात केवल दिखावा बनकर रह जाएगी। जरूरी है कि प्रशासन इस दिशा में तुरंत हस्तक्षेप कर पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जवाबदेही सुनिश्चित करे।




0 टिप्पणियाँ