"हर घर नल से जल" का सपना आनंदपुर में आज भी अधूरा है। गांव में पेयजल संकट इतना विकराल रूप ले चुका है कि आम नागरिक ही नहीं, अब पत्रिका समाचार पत्र के वरिष्ठ पत्रकार श्री संजय चौरसिया को भी अपने घर के लिए 1 किलोमीटर दूर पुराने कुएं से पानी लाना पड़ रहा है।
इस जल संकट की मार्मिक तस्वीर तब सामने आई जब पत्रकार संजू चौरसिया का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में वे अपने सिर पर दो बड़े-बड़े बर्तनों में पानी भरकर घर की ओर जाते नजर आ रहे हैं। यह दृश्य न केवल ग्रामीणों की पीड़ा को उजागर करता है, बल्कि व्यवस्था पर भी करारा तमाचा है।
इस वीडियो के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं उमड़ पड़ी हैं। किसी ने इसे "व्यवस्था की असफलता" बताया तो किसी ने इसे "सच्ची पत्रकारिता का उदाहरण" करार दिया। कई यूज़र्स ने कमेंट कर कहा, "जब पत्रकार को खुद पानी लाना पड़े, तो समझिए आम नागरिक किस हाल में होंगे।"
पत्रकार संजू चौरसिया के वीडियो पर सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में प्रतिक्रियाएं आईं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
सौरभ श्रीवास्तव ने लिखा:
"विधायक महोदय जल संकट पर ध्यान क्यों नहीं दे रहे? विधायक निधि से दो बोर कराकर इस संकट को अभी खत्म किया जा सकता है।"
सूरज अहिरवार ने लिखा:
"सम्मानीय साथियो, ग्राम पंचायत आनंदपुर में पीने के पानी की बहुत किल्लत है। 6 दिन में एक बार नल से पानी आता है। कई मोहल्लों में पाइप लाइनें ही नहीं डलीं। मैं खुद 600 फीट पाइप डालकर पानी भरता हूं। दुखड़ा किसे सुनाएं?"
रणजीत सिंह बघेल ने तंज कसते हुए लिखा:
"अंधेर नगरी चोपट राजा, हमारे भाईसाहब से पानी भरवा जा... कलम की धार को तेज कर जल संकट खत्म कराओ भाईसाहब!"
बीजेपी के वरिष्ठ नेता राम मोहन पाराशर ने लिखा:
"एक कर्मठ स्वयंसेवक हर स्थिति में तत्पर।"
वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र मीणा ने सवाल उठाया:
"बेसे सुना था कि अब आनंदपुर में पानी की कमी नहीं है, फिर ये क्या कर रहे हो संजू भाई?"
पूर्व शिक्षक जय नारायण शर्मा ने अतीत की याद दिलाते हुए कहा:
"पहले हर घर में बैलगाड़ी से पानी की टंकी भरकर आती थी।"
तीन टंकियाँ, फिर भी प्यासे ग्रामीण
गांव में तीन जल टंकियाँ हैं — एक बीस वर्ष पुरानी टंकी आज भी सेवा दे रही है, लेकिन सीमित क्षमता के कारण सभी ग्रामीणों की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रही। दूसरी टंकी, तीन-चार साल पहले बनी, आज तक चालू नहीं हो सकी। भ्रष्टाचार और तकनीकी लापरवाही के कारण यह केवल एक बेकार ढांचे में तब्दील हो गई है। तीसरी टंकी, दो वर्ष पूर्व बनी, आंशिक रूप से कार्यरत है, लेकिन उससे भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा।
पूर्व जनप्रतिनिधियों के प्रयास, लेकिन अधूरा अमल
गौरतलब है कि पूर्व मंत्री स्वर्गीय लक्ष्मीकांत शर्मा और पूर्व विधायक श्री गोवर्धन उपाध्याय द्वारा भी आनंदपुर में पेयजल समस्या को दूर करने के प्रयास किए गए थे। योजनाएं बनीं, नल-जल योजना के तहत टंकियाँ भी बनाई गईं, लेकिन क्रियान्वयन और देखरेख की गंभीर कमी के कारण वे योजनाएं ज़मीन पर उतर नहीं सकीं।
वहीं कुछ लोगों ने सवाल उठाया है कि आखिर करोड़ों रुपये की योजनाएं कहां गईं? और जवाबदेह अधिकारी अब तक क्या कर रहे हैं?
नल-जल योजना से लेकर टंकी निर्माण तक की पहलें हुईं, लेकिन योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी की कमी ने उन्हें अधूरा छोड़ दिया।
ग्रामीणों की पीड़ा और अपील
ग्रामीणों का कहना है कि पानी की व्यवस्था केवल योजनाओं से नहीं, ईमानदारी और जिम्मेदारी से होती है। जब टंकियाँ सिर्फ दिखावे के लिए बनें और प्रशासन आंख मूंदे बैठा रहे, तो जनता को ही बाल्टी और बर्तन उठाकर पानी लाना पड़ता है।
निष्कर्ष:
आनंदपुर का जल संकट केवल स्थानीय समस्या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है — क्या सरकारी योजनाओं का उद्देश्य केवल आंकड़े भरना है, या ज़मीन पर बदलाव लाना भी ज़रूरी है? वायरल वीडियो ने इस सवाल को और तीखा कर दिया है। उम्मीद है, अब सिर्फ सोशल मीडिया पर चर्चा नहीं, बल्कि जिम्मेदार एक्शन भी होगा।




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