"जब सत्ता की सनक ने श्रद्धा को रौंदा: चामुंडा टेकरी पर अहंकार की अर्धरात्रि" जब आस्था पर अहंकार भारी पड़ने लगे

संपादकीय
शुभम सोनी विदिशा । जब आस्था पर अहंकार भारी पड़ने लगे देवास की पवित्र चामुंडा टेकरी पर हाल ही में जो हुआ, वह न सिर्फ निंदनीय है, बल्कि यह उस मानसिकता का आईना भी है, जो सत्ता और प्रभाव के नशे में धार्मिक मर्यादाओं को रौंद डालती है। रात के सन्नाटे में मंदिर के पट जबरन खुलवाना, पुजारी को धमकाना और मारपीट करना—क्या यह किसी धर्म, संस्कृति या कानून के दायरे में आता है?

घटना के केंद्र में एक विधायक पुत्र रुद्राक्ष शुक्ला हैं, जिनका नाम पहले भी नियमों के उल्लंघन में सामने आ चुका है। सवाल यह नहीं कि वह किस पार्टी से है, सवाल यह है कि क्या सत्ता की छाया में ऐसे लोग कानून से ऊपर हो जाते हैं?

मंदिरों का एक अनुशासन होता है। वहां समय तय होता है, नियम होते हैं, और सबसे बड़ी बात—वह एक श्रद्धा का केंद्र होता है। जब कोई व्यक्ति—चाहे वह किसी रसूखदार परिवार से हो—अपने दोस्तों का काफिला लेकर मंदिर में रात एक बजे घुसने की जिद करे और इनकार करने पर पुजारी से बदसलूकी करे, तो यह केवल कानून नहीं, आस्था का भी अपमान है।

इस तरह की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि सत्ता से जुड़े कुछ लोगों को यह भ्रम हो गया है कि मंदिर उनके निजी ठिकाने हैं और पुजारी उनके सेवक। यह सोच जितनी खतरनाक है, उतनी ही शर्मनाक भी।

पुलिस ने भले ही एफआईआर दर्ज कर ली हो और सीसीटीवी की जांच कर रही हो, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कार्रवाई निष्पक्ष और प्रभावी होगी? या फिर यह मामला भी रसूख के नीचे दब जाएगा?

यह समय है जब समाज को, मीडिया को और खासकर धार्मिक संगठनों को इस मामले में आवाज उठानी चाहिए। अगर आज मंदिर के नियमों को ताक पर रखकर ऐसी दबंगई स्वीकार की गई, तो कल हर श्रद्धालु की आस्था जोखिम में होगी।

सत्ता का नशा चढ़ता है, लेकिन जब वही नशा धर्मस्थलों की मर्यादा तोड़ने लगे, तो यह न सिर्फ कानून का उल्लंघन होता है, बल्कि संस्कृति के मूल में भी एक चोट होती है।

देवास की चामुंडा टेकरी सिर्फ एक मंदिर नहीं, आस्था का शिखर है। उसे अपमानित करने वालों को कानूनी, सामाजिक और नैतिक तीनों स्तरों पर जवाबदेह ठहराना होगा।

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