प्रदेश के 225 कॉलेजों में जनभागीदारी समिति अध्यक्ष बनने के बाद प्राचार्यों को बड़ी समस्या

प्रदेश के 225 कॉलेजों में जनभागीदारी समिति अध्यक्ष बनने के बाद प्राचार्यों को बड़ी समस्या
225 कॉलेजों में जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष बनने से  प्राचार्यों की बड़ी मुसीबत
 
कार्यालय स्टाफ सुख-सुविधाओं पर विवाद की स्थिति

कार्यालय , विजिटिंग कार्ड , लेटरपेड सहित अन्य स्टाफ की मांग से बढ़ेगा अतिरिक्त भार

भोपाल , मध्यप्रदेश के 225 कालेजों में 2014 के बाद जनभागीदार समिति के अध्यक्षों की नियुक्तियां हुई हैं । अब अध्यक्षों ने कालेजों में अपने अधिकार जमाना शुरू कर दिए हैं । अब प्राचार्यों से पृथक से कार्यालय और स्टाफ के साथ अन्य सुविधाओं की मांग करने लगे हैं । इससे प्राचार्यों की समस्याएं बढ़ना शुरू हो गई है । क्योंकि अध्यक्षों को कालेजों से कोई भी सुविधा लेने का अधिकार नहीं हैं । इसके बाद भी प्राचार्यों पर दबाव बना रहे हैं । जनभागीदारी समिति के अध्यक्षों की नियुक्तियां हुऐ अभी दो माह ही हुए हैं और वे अब कालेजों पर अनैतिक अधिकार जमाना चाहते हैं । इसके लिऐ उन्होंने प्राचार्यों से पृथक से कार्यालय , विजिटिंग कार्ड , लेटरपेड सहित अन्य स्टाफ की मांग करने लगे हैं । जबकि उच्च शिक्षा विभाग द्वारा 09.01.2006 में जारी किए गए आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कहा गया है कि अध्यक्ष व सदस्यों को पृथक से कार्यालय आवंटित करने का प्रावधान नहीं हैं । और ना ही वे किसी भी प्रकार का फर्नीचर मांग सकते हैं । राज्य शासन द्वारा निर्णय लिया गया है कि समिति का कोई कार्यालय नहीं होगा । अतः पृथक से कक्ष और फर्नीचर का प्रश्न ही नहीं उठता है । हालांकि प्राचार्यों को भी विभागीय आदेश की जानकारी नहीं हैं । इसलिए उनके सामने ज्यादा समस्याएं आ रही हैं । इसलिए उन्होंने अध्यक्षों की मांग का पत्र तैयार कर विभाग को भेजना शुरू कर दिया है । विभाग उन्हें पूर्व में जारी किए गए आदेश की प्रति के साथ अध्यक्षों के दयित्वों की सूची भी भेजना का कार्य करने में लगा हुआ है ।


कई कॉलेजों के प्रिंसिपल का मानना है की वह अध्यक्ष के बिना ही ठीक थे
 अब जब प्रदेश के कॉलेजों में जनभागीदारी अध्यक्ष बना दिए गए हैं तो इसको लेकर कॉलेजों के प्रिंसिपल ओं की अपनी-अपनी राय है| कॉलेजों के प्राचार्यों का कहना है कि जनभागीदारी समिति के अध्यक्षों का लाभ का पद नहीं है । उन्हें शासन द्वारा नियुक्त किए हैं । अध्यक्ष समाजसेवा नहीं बल्कि राजनैतिक पृष्ठभूमि की हैं । इसलिये वे कालेजों से काफी सुख सुविधाओं की मांग कर रहे हैं । बिना अध्यक्ष के एडीएम और एसडीएम जनभागीदारी का पूर्ण कार्य आसानी से कर देते थे । यहां तक उचित कार्रवाई तक करते रहे हैं । वर्तमान में अध्यक्षों द्वारा कालेज के हितों में कोई निर्णय नहीं लिए जा रहे हैं । इससे तो कालेज बिना अध्यक्ष के ठीक संचालित हो रहे थे ।

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