कैथा में भागवत कथा का तीसरा दिन: ध्रुव-प्रह्लाद की अटूट भक्ति का बखान


कपिल मुनि के सांख्य दर्शन और पुरंजनोपाख्यान से समझाया मानव जीवन का मर्म

रीवा। कैथा स्थित प्राचीन श्री हनुमान मंदिर परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत भक्ति ज्ञान महायज्ञ के तीसरे दिन गुरुवार को तृतीय एवं चतुर्थ स्कंध की कथा का वर्णन हुआ। आचार्य डॉ. गौरीशंकर शुक्ला ने कपिल मुनि, भक्त प्रह्लाद और बालक ध्रुव के चरित्रों के माध्यम से भक्ति, संस्कार और दृढ़ संकल्प का महत्व बताया।

कथा में कपिल मुनि के सांख्य दर्शन, सृष्टि की उत्पत्ति, वराह अवतार और कपिल गीता के प्रसंगों का वर्णन किया गया। वहीं पुरंजनोपाख्यान के माध्यम से समझाया गया कि मनुष्य को अपना अमूल्य जीवन इंद्रियों के भोग-विलास में नष्ट करने के बजाय भक्ति, ज्ञान और सद्कर्मों में लगाना चाहिए।
प्रह्लाद की भक्ति ने सिखाया अटूट विश्वास का संदेश

प्रह्लाद-हिरण्यकश्यपु प्रसंग में बताया गया कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद प्रह्लाद भगवान विष्णु की भक्ति से विचलित नहीं हुए। उनका विश्वास था कि भगवान कण-कण में विद्यमान हैं। इसी अटूट आस्था के कारण भगवान नृसिंह का प्राकट्य हुआ।

पांच वर्ष के ध्रुव ने तपस्या से पाया भगवान का आशीर्वाद

बालक ध्रुव की कथा में बताया गया कि सौतेली माता के व्यवहार से आहत ध्रुव ने भगवान विष्णु की तपस्या का संकल्प लिया। नारद मुनि से प्राप्त “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप कर ध्रुव ने कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अटल स्थान प्रदान किया, जिसे ध्रुव तारे के रूप में जाना जाता है।

कथा में कहा गया कि ध्रुव और प्रह्लाद के चरित्र बच्चों को संस्कार, दृढ़ संकल्प और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास की प्रेरणा देते हैं। भारतीय संस्कृति और संस्कारों की रक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

31 अगस्त से 7 सितंबर तक चल रही इस श्रीमद्भागवत कथा में श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर कथा श्रवण का आग्रह किया गया है।

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