ग्रामीण न्याय व्यवस्था की उपेक्षा पर राष्ट्रीय वेबीनार में चिंता, ग्राम न्यायालय अधिनियम को देशभर में लागू करने की मांग

रीवा/नई दिल्ली, 31 मई। ग्रामीण और शहरी न्याय व्यवस्था के बीच बढ़ती असमानता तथा ग्राम न्यायालयों की उपेक्षा के मुद्दे पर रविवार को आयोजित 310वें राष्ट्रीय साप्ताहिक वेबीनार में न्यायविदों, पूर्व न्यायाधीशों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गंभीर चिंता व्यक्त की। वेबीनार का विषय था— “ग्रामीण और शहरी न्याय व्यवस्था में भारी असमानता: ग्राम न्यायालयों की तुलना में कॉर्पोरेट अदालतों को प्राथमिकता”

कार्यक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आदित्य नाथ मित्तल और कमलेश्वर नाथ, पूर्व मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह, फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के प्रवीण पटेल, आरटीआई विशेषज्ञ वीरेंद्र कुमार ठक्कर सहित कई विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया।

वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2008 में पारित ग्राम न्यायालय अधिनियम का उद्देश्य गांवों तक सस्ता और सुलभ न्याय पहुंचाना था, लेकिन देशभर में प्रस्तावित लगभग 6 हजार ग्राम न्यायालयों के मुकाबले केवल 264 न्यायालय ही सक्रिय हैं। इसके विपरीत, कॉर्पोरेट और व्यावसायिक विवादों के निपटारे के लिए स्थापित कमर्शियल कोर्ट्स को पर्याप्त संसाधन, तकनीकी सुविधाएं और प्राथमिकता प्रदान की जा रही है।

न्यायमूर्ति आदित्य नाथ मित्तल और न्यायमूर्ति कमलेश्वर नाथ ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में न्यायिक ढांचे की कमी और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण आम नागरिकों को वर्षों तक न्याय के लिए भटकना पड़ता है। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे मामलों के निपटारे में 10 से 15 वर्ष तक लग जाना न्याय व्यवस्था की गंभीर चुनौती है।

पूर्व सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि पंचायत आधारित मध्यस्थता, सुलह और वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को मजबूत कर अधिकांश ग्रामीण विवादों का स्थानीय स्तर पर समाधान किया जा सकता है। इससे न्यायालयों पर बढ़ते मुकदमों के बोझ को भी कम किया जा सकेगा।

वेबीनार में प्रशासनिक जवाबदेही, न्यायपालिका में पारदर्शिता, आरटीआई के प्रभावी उपयोग और डिजिटल गवर्नेंस को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि भ्रष्टाचार, संसाधनों की कमी और कमजोर क्रियान्वयन ग्रामीण न्याय व्यवस्था की प्रमुख बाधाएं हैं।

सभी प्रतिभागियों ने एकमत से केंद्र और राज्य सरकारों से ग्राम न्यायालय अधिनियम-2008 को प्रभावी रूप से लागू करने, पर्याप्त बजटीय प्रावधान सुनिश्चित करने तथा गांवों तक न्याय की पहुंच बढ़ाने की मांग की। उन्होंने कहा कि जब तक देश के अंतिम व्यक्ति को समय पर और सस्ता न्याय नहीं मिलेगा, तब तक समावेशी विकास का लक्ष्य अधूरा रहेगा।

वेबीनार में न्यायविदों, आरटीआई कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और देशभर से सैकड़ों प्रतिभागियों ने सहभागिता की।

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