शुभम सोनी लटेरी विदिशा। मध्यप्रदेश के विदिशा जिले की तहसील के ग्राम कालादेव में दशहरे के अवसर पर हर साल एक अनोखा और अद्भुत आयोजन होता है। यहाँ रावण की सेना राम की सेना पर पत्थरों की बरसात करती है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से एक भी पत्थर रामदल को छू तक नहीं पाता। यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश अद्वितीय ढंग से देती है।
सप्ताहभर पहले शुरू होती तैयारी
इस आयोजन की रूपरेखा एक सप्ताह पहले ही तैयार कर ली जाती है। इसमें प्रशासन और पुलिस की अहम भूमिका रहती है। सुरक्षा, यातायात और मेले की व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि यह आयोजन पूरी तरह शांतिपूर्ण और सुरक्षित ढंग से सम्पन्न हो सके।
आयोजन का दृश्य : मानो असली रणभूमि
शाम ढलते ही हजारों लोग कालादेव के मैदान में जुट जाते हैं। चारों तरफ “जय श्रीराम” के नारे गूंजते हैं। मैदान में रावण की विशाल स्थायी प्रतिमा सजाई जाती है और उससे करीब 200 मीटर दूर राम का ध्वज गाड़ा जाता है।
जैसे ही कालादेव के ग्रामीण रामदल के रूप में ध्वज की परिक्रमा शुरू करते हैं, वैसे ही रावणदल के रूप में खड़े आदिवासी और बंजारे गोफन (गुलेल) में पत्थर भरकर कतारबद्ध हो जाते हैं। देखते ही देखते पूरा मैदान रणभूमि में बदल जाता है और पत्थरों की बरसात शुरू हो जाती है। लोग सांसें थामे यह अद्भुत दृश्य देखते रहते हैं कि किस तरह पत्थरों की बौछार होने के बावजूद रामदल का कोई भी व्यक्ति चोटिल नहीं होता।
आस्था से जुड़ी मान्यता
ग्रामीण मानते हैं कि यदि कोई बाहरी व्यक्ति रामदल में शामिल हो जाए तो उसे पत्थर लग सकता है और वह घायल हो सकता है। यही कारण है कि राम की सेना में केवल स्थानीय लोग ही भाग लेते हैं। यह परंपरा राम-रावण युद्ध के प्रतीक के रूप में आस्था और विश्वास का केंद्र बनी हुई है।
राम रथ और धार्मिक आकर्षण
दशहरे के दिन भगवान श्रीराम का रथ विशेष रूप से सजाया जाता है। भगवान राम उसमें विराजमान होकर अपनी सेना के साथ मैदान में आते हैं। रथ की भव्यता और भगवान की झांकी पूरे आयोजन का मुख्य आकर्षण होती है।
क्षेत्र के विधायक उमाकांत शर्मा ने भी भगवान राम के रथ की पूजा-अर्चना कर उन्हें पुष्पहार पहनाया।
शांतिपूर्ण ‘युद्ध’ की मिसाल
करीब एक घंटे तक चलने वाले इस प्रतीकात्मक युद्ध में रावण की सेना में दूर-दराज से आए अनुभवी गोतिया धारी शामिल होते हैं। इसके बावजूद हर साल की तरह इस बार भी किसी को चोट नहीं लगी। यह परंपरा शस्त्रों या तीर-कमान से नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास से जुड़ी है, जिसमें बुराई का प्रतीक रावण हमेशा पराजित होता है।




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