
शुभम सोनी संपादकीय : मनीष कश्यप के साथ जो हुआ वह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और व्यवस्था की आपसी खींचतान का आईना है
पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) में यूट्यूबर और बीजेपी नेता मनीष कश्यप के साथ जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक व्यक्ति पर हुआ हमला नहीं था — यह उस सड़ते हुए तंत्र की बानगी है, जहां असहमति, असुविधा और सवाल पूछने की कीमत लाठियों और बंद दरवाजों से चुकानी पड़ती है। यह एक ऐसा प्रसंग है, जिसमें सत्ता, संस्थान और संवेदनहीनता की त्रयी स्पष्ट रूप से सामने आती है।
जूनियर डॉक्टरों और मनीष कश्यप के बीच हुई कहासुनी के बाद उन्हें पीटना, मोबाइल छीनना, वीडियो डिलीट करना और फिर एक कमरे में बंद कर देना – यह केवल चिकित्सकीय नैतिकता का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का भी अपमान है। अगर मनीष कश्यप ने कोई अनुचित भाषा का प्रयोग किया, तो इसके लिए कानून है, प्रशासन है – लेकिन क्या अस्पताल के भीतर भीड़तंत्र और गाली-घूंसे ही अब जवाब होंगे?
और आश्चर्य तो तब होता है जब पुलिस थाने के अधिकारी इस पूरे मामले को ‘सामान्य बहस’ करार देते हैं। न कोई शिकायत, न एफआईआर – क्या यह दर्शाता नहीं कि दबाव में व्यवस्था कैसे आंखें मूंद लेती है?
मनीष कश्यप विवादास्पद हो सकते हैं, उनकी पत्रकारिता पर सवाल उठ सकते हैं – पर ये सवाल लाठी और हिंसा से हल नहीं किए जा सकते। अगर किसी व्यक्ति को पत्रकार होने की कीमत जान से मारकर चुकानी पड़े, तो यह न सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन है, बल्कि एक भयावह संकेत है कि सत्ता के आगे असहज सवाल अब सहन नहीं किए जा रहे।
पीएमसीएच जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से यह अपेक्षा नहीं थी कि वहाँ के डॉक्टर 'संवेदनशील सेवक' के बजाय 'सत्ता संरक्षित हमलावर' के रूप में सामने आएंगे। चिकित्सक समाज के वो स्तंभ हैं जिनसे सबसे पहले न्याय, करुणा और संयम की अपेक्षा होती है। अगर वही लोग भीड़तंत्र के हाथों में खेलें, तो आम जनता किस पर भरोसा करे?
यह घटना यह भी बताती है कि जब पत्रकारों की पिटाई होती है और प्रशासन उसे “आपसी मामला” कहकर किनारे लगाता है, तो यह देश की प्रेस स्वतंत्रता की नब्ज पर प्रहार है।
मनीष कश्यप की राजनीति और उनकी पत्रकारिता से असहमति हो सकती है, लेकिन उन्हें पीटकर चुप कराने की सोच – तानाशाही की सोच है।
जरूरत इस बात की है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, दोषी डॉक्टरों पर कार्रवाई हो और अगर मनीष कश्यप ने भी कुछ अनुचित कहा या किया हो, तो उन्हें भी कानून के दायरे में लाया जाए – लेकिन न्याय की प्रक्रिया भीड़ और सत्ता-तंत्र के मेलजोल की बंधक न बने।
क्योंकि आज मनीष कश्यप थे, कल कोई और होगा – और अगर हम चुप रहे, तो अगला नंबर किसी आम नागरिक का भी हो सकता है।




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