कैथा में भागवत कथा का चौथा दिन: दधीचि के अस्थिदान और जड़ भरत के प्रसंग ने श्रद्धालुओं को किया भावविभोर

रीवा, 4 सितंबर 2026। यज्ञों की पावन स्थली कैथा स्थित प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में 31 अगस्त से 7 सितंबर तक आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में शुक्रवार को चौथे दिन जड़ भरत और महर्षि दधीचि के त्याग एवं तपस्या का प्रभावशाली वर्णन किया गया।

कथा व्यास आचार्य डॉ. गौरी शंकर शुक्ला ने श्रीमद्भागवत के पंचम, षष्ठम और सप्तम स्कंध के प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, कर्म, मोह, त्याग और लोककल्याण का संदेश दिया।

मोह से सावधान रहने का संदेश

जड़ भरत की कथा के माध्यम से बताया गया कि त्याग और तपस्या के मार्ग पर चलते हुए भी मनुष्य को मोह से सावधान रहना चाहिए। हिरण के बच्चे के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण जड़ भरत को मृत्यु के समय उसी का स्मरण रहा और अगले जन्म में उन्हें मृग योनि प्राप्त हुई।

कथा में यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि मनुष्य के कर्म और अंतिम समय के भाव उसके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। जड़ भरत के अगले जन्मों के प्रसंग के माध्यम से कर्मफल और पुनर्जन्म के सिद्धांत को समझाया गया।

लोककल्याण के लिए दधीचि ने दे दीं अस्थियां

कथा का सबसे भावुक प्रसंग महर्षि दधीचि के अस्थिदान का रहा। बताया गया कि वृत्तासुर के अत्याचार से देवताओं को मुक्ति दिलाने के लिए ऐसा अस्त्र आवश्यक था, जो केवल महर्षि दधीचि की अस्थियों से ही बनाया जा सकता था।

देवताओं के आग्रह पर महर्षि दधीचि ने बिना किसी स्वार्थ के लोककल्याण के लिए अपने शरीर तक का त्याग कर दिया। उनकी अस्थियों से बने वज्र से वृत्तासुर का वध किया गया।

आचार्य शुक्ला ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति की मूल भावना “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” है। महर्षि दधीचि का जीवन इसी भावना का अद्भुत उदाहरण है—जहां व्यक्ति अपने सुख से ऊपर उठकर समाज और समस्त जीव-जगत के कल्याण को प्राथमिकता देता है।

7 सितंबर तक कथा का आयोजन

कथा के दौरान अब तक भगवान विष्णु के अवतार, ब्रह्मा की उत्पत्ति, नारद जी के पूर्व जन्म, राजा परीक्षित, ध्रुव और प्रह्लाद चरित्र सहित अनेक प्रसंगों का वर्णन किया जा चुका है।

कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही इस पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद्भागवत कथा में श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर कथा श्रवण करने का आग्रह किया गया है।

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