RTI एक्टिविज्म को ‘बिजनेस’ बताने वाली सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर 313वें वेबिनार में बहस, पूर्व जजों ने रखे अलग-अलग मत

रीवा |  सुप्रीम कोर्ट की एक हालिया मौखिक टिप्पणी, जिसमें आरटीआई एक्टिविज्म को “नया बिजनेस” बताया गया था, को लेकर रविवार को आयोजित 313वें आरटीआई वेबिनार में देशभर के विधि विशेषज्ञों, पूर्व न्यायाधीशों और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने चर्चा की। वेबिनार में इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने अपने विचार रखते हुए कहा कि किसी एक मामले में की गई मौखिक टिप्पणी का सामान्यीकरण करना उचित नहीं है।
यह विवाद हरियाणा के एक सड़क निर्माण कार्य से जुड़े मामले में दो आरटीआई आवेदकों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के दौरान सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ की मौखिक टिप्पणियों के बाद सामने आया था।
पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आदित्य नाथ मित्तल ने कहा कि बिना पूरे प्रकरण की जानकारी के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। उन्होंने माना कि आरटीआई और जनहित याचिकाओं का कुछ मामलों में दुरुपयोग भी होता है, लेकिन केवल अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने को अत्यधिक गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए।

वहीं जस्टिस कमलेश्वरनाथ ने कहा कि न्यायालयों को सुनवाई के दौरान अनावश्यक बयानबाजी से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों की निगरानी करना तथा सवाल पूछना जनता का संवैधानिक अधिकार है। जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता के बीच आम नागरिकों द्वारा जवाबदेही मांगना लोकतंत्र का हिस्सा है।
जस्टिस सुधीर सक्सेना ने कहा कि आरटीआई कानून ने भ्रष्टाचार के कई मामलों को उजागर किया है, लेकिन दोषियों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होना चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि आरटीआई कार्यकर्ताओं को सामान्य रूप से ब्लैकमेलर कहना उचित नहीं है और किसी एक मामले के आधार पर पूरे समुदाय को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता।

गुजरात के सामाजिक कार्यकर्ता संतोष कुमार राठौर ने कहा कि जमीनी स्तर पर आरटीआई कार्यकर्ताओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जानकारी प्राप्त करने के लिए उन्हें अपील, शिकायत और न्यायालयों तक का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में आरटीआई एक्टिविज्म को व्यवसाय कहना उचित नहीं है।
उत्तराखंड के आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने प्रस्तुति देते हुए कहा कि आरटीआई कानून के माध्यम से देश में अनेक बड़े भ्रष्टाचार उजागर हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि अब तक किसी न्यायिक आदेश में यह सिद्ध नहीं हुआ है कि केवल आरटीआई का उपयोग कर किसी व्यक्ति ने ब्लैकमेलिंग की हो।
फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के संयोजक प्रवीण पटेल ने कहा कि न्यायपालिका की टिप्पणियों को समाज गंभीरता से लेता है, इसलिए न्यायालयों को अधिक संयम और जिम्मेदारी के साथ अपनी बात रखनी चाहिए।

वेबिनार का संचालन सामाजिक एवं आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों के आरटीआई कार्यकर्ताओं ने भाग लेकर अपने विचार व्यक्त किए।

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