सीजेआई के ‘काकरोच-परासाइट’ बयान पर वेबीनार में गरमाई बहस


न्यायपालिका की जवाबदेही, आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और डिजिटल मीडिया की भूमिका पर मंथन

रीवा, 17 मई। आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप इंडिया, फोरम फॉर फास्ट जस्टिस एवं मिशन फ्री लीगल एजुकेशन के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को 308वें राष्ट्रीय आरटीआई एवं विधिक वेबीनार का आयोजन किया गया। ऑनलाइन जूम बैठक सुबह 11 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक चली, जिसमें देशभर से न्यायविद, सूचना अधिकार कार्यकर्ता, अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।
वेबीनार का मुख्य विषय भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत द्वारा मीडिया एवं आरटीआई कार्यकर्ताओं को लेकर दिए गए कथित “काकरोच” और “परासाइट” संबंधी बयान रहे। प्रतिभागियों ने इस बयान पर चिंता जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में आलोचना को विरोध मानना आमजन की आवाज को कमजोर कर सकता है।
कार्यक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुधीर कुमार सक्सेना एवं न्यायमूर्ति राजीव लोचन मेहरोत्रा ने सहभागिता करते हुए न्यायपालिका, सोशल मीडिया और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। वक्ताओं ने कहा कि न्यायपालिका के पद पर बैठे लोगों के वक्तव्यों में संयम, सामाजिक समरसता और जिम्मेदारी का होना जरूरी है।

न्यायिक भ्रष्टाचार और सुधार पर उठे सवाल

चर्चा के दौरान न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता पर जोर दिया गया। जस्टिस सुधीर सक्सेना ने कहा कि भ्रष्टाचार को उजागर करने में आरटीआई की महत्वपूर्ण भूमिका है और इसके उपयोग को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अधिवक्ताओं की बढ़ती संख्या पर चिंता व्यक्त की।
उन्होंने ऐसे अधिवक्ताओं के मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष न्यायालय गठित करने की मांग उठाई। वक्ताओं ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने के लिए सुधारात्मक कदम उठाना आवश्यक है।
आरटीआई कार्यकर्ताओं ने साझा किए अनुभव

आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी और प्रवीण पटेल ने सूचना का अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन में आ रही चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि कई मामलों में सूचना मांगने वालों को प्रताड़ना और प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ता है।
भोपाल के आरटीआई कार्यकर्ता हरीश सोलंकी ने जेलों की बदहाल स्थिति, भीड़भाड़ और चिकित्सा सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से उन्हें मुआवजा भी प्राप्त हुआ है।

डिजिटल मीडिया और न्यायिक स्वतंत्रता पर चर्चा

आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने 2012 से 2023 तक डिजिटल मीडिया, न्यायपालिका और आरटीआई से जुड़े प्रमुख मामलों का उल्लेख करते हुए विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया। उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सूचना तक पहुंच को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना और न्यायालय अवमानना जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं।
उन्होंने सूचना आयोग की सीमित शक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आयोग केवल सूचना उपलब्ध कराने, जुर्माना लगाने और अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है, जबकि आपराधिक कार्रवाई के लिए अलग कानूनी प्रक्रिया अपनानी होती है।

लोकतंत्र में आलोचना जरूरी : राहुल सिंह

पूर्व सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि मीडिया और आरटीआई कार्यकर्ताओं को “परजीवी” बताने जैसी टिप्पणियां लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।
कार्यक्रम में पुलिस प्रताड़ना, झूठी एफआईआर, पर्यावरणीय मामलों, मानवाधिकार और न्यायिक प्रक्रियाओं में देरी जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

वेबीनार का संचालन सामाजिक एवं आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया। अंत में प्रतिभागियों ने न्यायिक सुधार, पारदर्शिता और आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए निरंतर संवाद और जनजागरूकता की आवश्यकता पर बल दिया।

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