
शुभम सोनी संपादकीय लेख । लटेरी में आयोजित जिला स्तरीय जनसुनवाई की खबर सुनकर सचमुच “खुशी” हुई। आखिर लोकतंत्र में जनता की सुनवाई हो रही है, समस्याओं का निराकरण हो रहा है और प्रशासन सक्रिय दिखाई दे रहा है। आंकड़े भी मुस्कुरा रहे हैं — 249 आवेदन, 149 का मौके पर निराकरण। कागज़ों पर यह उपलब्धि है, प्रेस नोट में यह सफलता की कहानी है, और सोशल मीडिया पर यह सुशासन का उत्सव।
लेकिन लेखक और एक पत्रकार का काम केवल तालियां बजाना नहीं, सवाल पूछना भी है।
17 फरवरी 2026 की दोपहर एक दिव्यांग महिला, मोहनपुरा खुर्द से, जमीन पर सरकते हुए कलेक्टर तक पहुंची। समस्या क्या थी? लाड़ली बहन योजना में नाम जुड़वाना और राशन पर्ची में नाम दर्ज कराना। कलेक्टर ने तुरंत कुर्सी मंगवाई, महिला को बिठाया समस्या सुनी और व्हीलचेयर देकर समाधान कर दिया। राशन पर्ची और लाडली बहन योजना का समाधान तो हो ही जाएगा दृश्य मानवीय संवेदना का उदाहरण है — निस्संदेह प्रशंसनीय।
परंतु प्रश्न यह है कि क्या यह दृश्य होना ही नहीं चाहिए था?
क्या ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए थी कि उस महिला को अपने गांव में ही यह काम हो जाता? क्या उसे अपनी दिव्यांगता के साथ 15–20 किलोमीटर की दूरी तय कर तहसील मुख्यालय से भी आगे एसडीएम कार्यालय तक आना आवश्यक था? यदि एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया “सफलता की कहानी” बन जाए, तो यह कहानी जितनी प्रेरक लगती है, उतनी ही चिंताजनक भी है।
ग्राम पंचायत बलरामपुर के किसान बैजनाथ सिंह कुशवाहा की फार्मर आईडी मौके पर बन गई। मुस्कुरा पंचायत के 10 माह के दिव्यांश प्रजापति का आधार कार्ड मिनटों में तैयार हो गया। परिवार खुश, किसान संतुष्ट, प्रशासन प्रसन्न।
लेकिन क्या यह खुशी इस बात की नहीं कि जो काम महीनों से अटका था, वह अंततः हुआ?
और क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं कि वह काम पहले क्यों नहीं हुआ?
जनसुनवाई का उद्देश्य जटिल, गंभीर और असाधारण मामलों का समाधान होना चाहिए। यदि आधार कार्ड, फार्मर आईडी और राशन पर्ची जैसे बुनियादी कार्य जिला स्तरीय हस्तक्षेप के बाद ही पूरे हों, तो यह निचले स्तर की प्रशासनिक शिथिलता पर प्रश्नचिह्न है।
149 आवेदनों का निराकरण — यह संख्या उपलब्धि है, पर साथ ही यह 149 ऐसी समस्याओं का प्रमाण भी है जिन्हें स्थानीय स्तर पर सुलझाया जा सकता था। जब हर छोटी समस्या “कलेक्टर दरबार” में जाकर हल हो, तो पंचायत, सचिव, पटवारी और लोकसेवा केंद्र की भूमिका पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।
कि हम व्यवस्था की सामान्य कार्यक्षमता को भी “सफलता” मानकर उत्सव मना रहे हैं। जैसे ट्रेन समय पर आ जाए तो उसे ऐतिहासिक घटना घोषित कर दिया जाए। जैसे बिजली का बिल सही आ जाए तो उसे प्रशासनिक क्रांति कह दिया जाए।
मेरे लेखनी का मकसद प्रशासन की संवेदनशीलता पर प्रश्न उठाना नहीं है; बल्कि उस संरचना पर सवाल करना है जहां संवेदनशीलता को असाधारण घटना बनना पड़ता है। असली सफलता तब होगी जब किसी दिव्यांग महिला को जमीन पर सरककर न्याय तक पहुंचने की आवश्यकता न पड़े, जब किसान को फार्मर आईडी के लिए जनसुनवाई के लिए तहसील मुख्यालय, जिला मुख्यालय, की चौखट न नापनी पड़े, और जब आधार कार्ड बनवाना जनसुनवाई की “कहानी” नहीं बल्कि सामान्य प्रक्रिया हो।
लोकतंत्र में जनसुनवाई आवश्यक है, पर उससे भी अधिक आवश्यक है ऐसी व्यवस्था जहां सुनवाई की नौबत कम आए।
तालियां प्रशासन के त्वरित निर्णय के लिए बजनी चाहिए,
पर सवाल व्यवस्था की स्थायी मजबूती के लिए पूछे जाने चाहिए।
क्योंकि आंकड़ों की सफलता से ज्यादा महत्वपूर्ण है व्यवस्था की विश्वसनीयता।




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