रीवा। सूचना का अधिकार अधिनियम को केवल सरकारी सूचनाएं हासिल करने का माध्यम न मानकर सामाजिक बदलाव, पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रभावी हथियार बनाने की जरूरत है। इसी उद्देश्य को लेकर 16 अगस्त को आयोजित विशेष वेबिनार में देशभर के समाजसेवियों, अधिवक्ताओं और नागरिक संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों ने आरटीआई के प्रभावी उपयोग पर मंथन किया।
वेबिनार का विषय ‘सूचना का अधिकार अधिनियम : सामाजिक परिवर्तन, वकालत और जवाबदेही का सशक्त माध्यम’ रहा। मुख्य वक्ता वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने कहा कि एनजीओ और नागरिक संगठन केवल सूचना प्राप्त करने तक सीमित न रहें, बल्कि उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर जनहित के मुद्दों को सामने लाकर नीतिगत बदलाव की दिशा में भी काम करें। उन्होंने आरटीआई अधिनियम की धारा 6 और धारा 8 के व्यावहारिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए नागरिकों को जागरूक करने की आवश्यकता बताई।
राशन से मनरेगा तक भ्रष्टाचार पर निगरानी
वेबिनार में आरटीआई के माध्यम से सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मनरेगा, स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और पर्यावरण से जुड़े मामलों में पारदर्शिता लाने के उदाहरण साझा किए गए। राशन दुकानों के स्टॉक रजिस्टर, मनरेगा के मस्टर रोल और विकास कार्यों से संबंधित अभिलेखों के जरिए गड़बड़ियों की पहचान करने में आरटीआई की भूमिका पर चर्चा हुई। पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप ने पासपोर्ट प्रक्रिया और रेलवे टिकट बुकिंग जैसी जनसुविधाओं में सुधार के लिए आरटीआई की भूमिका का उल्लेख किया।
किसानों और स्थानीय समस्याओं पर भी चर्चा
आरटीआई कार्यकर्ता राज तिवारी ने उर्वरक वितरण, फसल बीमा और मृदा परीक्षण से जुड़े किसानों के मुद्दे उठाए। वहीं अतिक्रमण, श्मशान घाटों की अव्यवस्था, सड़कों पर गिरे पेड़ों सहित स्थानीय नागरिक समस्याओं के समाधान के लिए कानूनी एवं प्रशासनिक उपायों को अपनाने पर जोर दिया गया।
‘दूसरे विभाग का मामला’ कहकर आवेदन नहीं हो सकता खारिज
चर्चा में आरटीआई आवेदनों से जुड़ी प्रक्रियात्मक गलतफहमियों को भी स्पष्ट किया गया। वक्ताओं ने कहा कि केवल यह कहकर कि सूचना किसी दूसरे विभाग से संबंधित है, आवेदन को मनमाने ढंग से खारिज नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही यह सलाह दी गई कि आरटीआई में किसी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने के बजाय रिकॉर्ड, नियम, प्रक्रिया और निर्णय से संबंधित तथ्यात्मक जानकारी मांगी जाए।
आयोगों में रिक्तियों और देरी पर चिंता
आरटीआई व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों पर भी वक्ताओं ने चिंता जताई। केंद्रीय एवं राज्य सूचना आयोगों में रिक्त पदों, अपीलों के लंबित रहने, समय पर जवाब नहीं मिलने और सूचना आयोग के आदेशों के बावजूद सूचना उपलब्ध नहीं होने जैसे मुद्दे उठाए गए। सूचना का व्यापक डिजिटलीकरण, अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण और आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई गई।
उत्तम चंद वशिष्ठ ने आरटीआई जागरूकता को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए ऑनलाइन कार्यक्रमों का बड़ी स्क्रीन पर प्रसारण तथा स्थानीय सूचना केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया। वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने ‘फोरम फॉर फास्ट जस्टिस’, ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ सोसाइटीज फॉर फास्ट जस्टिस’ और ‘मिशन फ्री लीगल एजुकेशन’ सहित विभिन्न पहलों की जानकारी दी। शिक्षा एवं भूमि नीति से जुड़े विषयों पर भी तकनीकी जानकारी साझा की गई।
कार्यक्रम में पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप, सुनील खंडेलवाल, राज तिवारी, उत्तम चंद वशिष्ठ, हरीश सोलंकी और अधिवक्ता रोहित त्रिपाठी सहित अन्य वक्ताओं ने विचार रखे। संचालन सामाजिक एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी ने किया। प्रचार-प्रसार में पवन दुबे तथा कार्यक्रम के मॉडरेशन में छत्तीसगढ़ के आरटीआई एक्टिविस्ट देवेंद्र कुमार अग्रवाल का सहयोग रहा।
वेबिनार के समापन पर वक्ताओं ने आरटीआई को लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए जन-जन तक इसके प्रभावी उपयोग की जानकारी पहुंचाने का संकल्प लिया। व्हाट्सऐप समूहों, रविवार की बैठकों और निरंतर प्रशिक्षण के माध्यम से आरटीआई कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।




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