फर्जी तरीके से बिना खात्मा FIR शून्य बताकर सभी आरोपियों को मिली क्लीन चिट।।*

बड़ी न्यायिक गलतियों का जिम्मेदार कौन? किन वजहों से कराधान घोटाले के मास्टरमाइंड हाईकोर्ट से पा रहे क्लीनचिट? यदि न्यायपालिका के आदेश में बड़ी गलतियां मिले तो फिर आम नागरिक को न्याय कैसे मिलेगा? मामला गंगेव जनपद की 38 ग्राम पंचायतों में व्यापक स्तर के कराधान घोटाले से है जुड़ा 

भारत के न्यायिक इतिहास की पहली ऐसी घटना जिसमें हाईकोर्ट को गुमराह करते हुए तथ्यविहीन जांच और फर्जी खात्मा रिपोर्ट पर कलेक्टर और कमिश्नर की जांच सहित FIR शून्य करार दिया गया 

फर्जी तरीके से बिना खात्मा FIR शून्य बताकर सभी आरोपियों को मिली क्लीन चिट।।*


 रीवा मध्य प्रदेश | भारतीय न्यायिक इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है जब एक व्यापक स्तर के कराधान घोटाले को लेकर हाईकोर्ट जबलपुर को गुमराह किए जाने का मामला सामने आया है। प्राप्त तथ्यों और सबूतों के आधार पर जो बात सामने निकल कर आई है उससे अब न्यायपालिका के ऊपर से लोगों का पूरी तरह से विश्वास उठने लगेगा। गंगेव जनपद की 38 ग्राम पंचायतों में हुए व्यापक स्तर के कराधान घोटाले में तत्कालीन कलेक्टर एवं कमिश्नर के जांच प्रतिवेदन में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार उजागर हुआ था। व्यापक स्तर के भ्रष्टाचार की जांच की गई और जांच प्रतिवेदन में जहां तत्कालीन कलेक्टर रीवा ओम प्रकाश श्रीवास्तव एवं तत्कालीन कमिश्नर रीवा संभाग अशोक भार्गव के द्वारा गठित संभाग स्तरीय जांच दल ने लगभग 12 करोड़ रुपए की राशि प्राइवेट वेंडरों के खातों में बिना कार्ययोजना और बिना कार्य कराए ही जारी कर दिए जाने का प्रतिवेदन दिया था उसके बाद लीपापोती का खेल प्रारंभ हुआ। मामले पर बिना किसी अधिकारिता के मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा स्वप्निल वानखेड़े द्वारा उक्त दोनों जांचों को कचरे के डिब्बे में डालते हुए जो जांच संभागस्तरीय अधिकारियों और अधीक्षण यंत्री स्तर के अधिकारी द्वारा की गई थी उसे वापस निचले स्तर के उपयंत्रियो और प्रभारी सहायक यंत्रियों के स्तर की अलग से जांच करवा दी गई जिसके आधार पर बाद में चलकर दोषी 27 ग्राम पंचायतों के 22 सरपंच सचिव इंजीनियर एवं कराधान घोटाले के मास्टरमाइंड निलंबित राजेश सोनी जनपद पंचायत गंगेव सहायक ग्रेड 3 को हाईकोर्ट जबलपुर से क्लीन चिट प्राप्त हो गई है।

हाईकोर्ट की इन याचिकाओं पर आरोपियों को सिंगल बेंच से मिली क्लीनचिट

   गौरतलब है कि कमिश्नर रीवा संभाग के तत्कालीन जांच और कलेक्टर रीवा के जांच प्रतिवेदन में कराधान घोटाला परिलक्षित होने के उपरांत दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही किए जाने का लेख किया गया था। जिन प्रतिवेदन के विरुद्ध आरोपी निलंबित लिपिक राजेश सोनी, शिवशक्ति कंस्ट्रक्शन के प्रोपराइटर नागेंद्र सिंह और रोजगार सहायक रही उनकी पुत्री प्रतिभा सिंह सहित लगभग 2 दर्जन ग्राम पंचायतों के दोषी सरपंच सचिव हाईकोर्ट में वसूली और कार्यवाही के विरुद्ध रिट पिटिशन दायर किए। उक्त रिट पिटिशन डब्लूपी 14826/2020 एवं इससे संबंधित अन्य लगभग आधा दर्जन रिट पिटिशन, जिनमें 2 दर्जन सरपंच सचिव पक्षकार थे, में हाईकोर्ट जबलपुर के द्वारा संबंधित शासन को नोटिस जारी किए जाने के बाद आनन-फानन में अलग से निचले इंजीनियर द्वारा जांच करवाई गई जिसमें प्रभारी सहायक यंत्री और उपयंत्री की जांच में बाद सीईओ जिला पंचायत रीवा स्वप्निल वानखेड़े द्वारा आरोपियों के विरुद्ध सभी कार्य होना बताया जाकर वसूली की राशि निरस्त कर दी गई जिसके बाद हाईकोर्ट जबलपुर द्वारा आरोपियों को राहत देते हुए उक्त याचिकाएं यह कहते हुए खारिज कर दिया गया क्योंकि प्रशासन ने आरोपियों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की है और मनगवां थाने में दर्ज एफआइआर क्रमांक 470/2020 में खात्मा लगने के कारण शून्य हो गई है इसलिए याचिका निष्फल करार दी जाती है।



आखिर जब एफ आई आर में खात्मा नहीं लगा तो किस आधार पर हाईकोर्ट के आदेश में खात्मे का जिक्र हुआ?

  सबसे बड़े विरोधाभास की स्थिति तो तब निर्मित हुई जब हाईकोर्ट के सिंगल बेंच जबलपुर की जज ने राजेश सोनी के रिट पिटिशन क्रमांक डब्लूपी 14826/2020 में यह लेख करते हुए राजेश सोनी की याचिका खारिज कर दी की क्योंकि दिनांक 26/08/2020 को मनगवां थाने में दर्ज एफआईआर पर पुलिस के द्वारा खात्मा लगा दिया गया है और प्रशासनिक अधिकारियों ने आरोपियों के विरुद्ध वसूली राशि वापस लेते हुए कार्यों को पूर्ण होना बता दिया है इसलिए डब्लूपी 14826/2020 निष्फल करार देते हुए निरस्त की जाती है। अब बड़ा सवाल यह था कि आखिर कलेक्टर और कमिश्नर की जांच के बाद किस अधिकारिता के तहत मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा स्वप्निल वानखेड़े निचले स्तर से जांच करवा रहे थे? क्या एक बार उच्च स्तरीय संभागीय टीम द्वारा जांच किए जाने के बाद उस पर लीपापोती करने का अधिकार मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा को था? फिर अगले बिंदु के तौर पर यदि मनगवां थाने में दर्ज उक्त एफ आई आर क्रमांक 470/2020 राजेश सोनी नागेंद्र सिंह और प्रतिभा सिंह के ऊपर दर्ज प्रकरण भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420, 120बी 66सी, 66डी पर यदि खात्मा नहीं हुआ था तो फिर किस आधार पर हाईकोर्ट के जजमेंट में खात्मा शब्द का उल्लेख किया जा रहा है?

सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा एसपी ऑफिस रीवा में लगाई गई आरटीआई में बड़ी जानकारी आई सामने

   दिनांक 18/11/2022 को हाईकोर्ट जबलपुर के वेबपोर्टल पर दर्शाए गए प्रकरण क्रमांक डब्लूपी 14826/2020 और इससे संबंधित अन्य लगभग 2 दर्जन प्रकरणों में निलंबित लिपिक राजेश सोनी शिव शक्ति ट्रेडर्स के प्रोपराइटर नागेंद्र सिंह और उसकी पुत्री प्रतिभा सिंह वाले मामले में पीडीएफ फाइल में उपलब्ध हाईकोर्ट के आर्डर में स्पष्ट तौर पर उल्लेख किया गया है कि उक्त एफआईआर क्रमांक 470/2020 थाना मनगवां में खात्मा लगा दिया गया है जिसके कारण आरोपी निलंबित लिपिक राजेश सोनी और अन्य के विरुद्ध लगाई गई उक्त हाईकोर्ट याचिका सारहीन और निष्फल होकर निरस्त की जाती है। जबकि इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय रीवा और अनुविभागीय अधिकारी पुलिस कार्यालय मनगवां में आरटीआई आवेदन लगाया तो जानकारी सामने आई जिसमें बताया गया कि राजेश सोनी वाले प्रकरण में किसी भी प्रकार से मामले पर खात्मा नहीं लगा है और प्रकरण अभी भी विचाराधीन है। जिस पर राजेश सोनी और नागेंद्र सिंह के विरुद्ध आज तक चार्जशीट भी कोर्ट में पेश नहीं हो पाई है। मात्र मामले पर आरोपी प्रतिभा सिंह के विरुद्ध चार्जशीट पेश हुई थी जिसके बाद उसकी गिरफ्तारी के उपरांत 4 माह कारावास में गुजारने के बाद जमानत पर रिहा होने पर मामला न्यायालय में अभी भी विचाराधीन है।

आखिर हाईकोर्ट को गुमराह करने वाली जानकारी देने वाले प्रशासनिक अधिकारियों और सरकारी अधिवक्ता पर कार्यवाही कब?

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस पूरे प्रकरण को जिन शिकायतकर्ताओं पूर्व गंगेव जनपद उपाध्यक्ष संजय पांडेय एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के द्वारा मामले को उच्चस्तर पर उठाया जाकर लगातार कार्यवाही के लिए शिकायतें की गई उन्हीं शिकायतकर्ताओं की बात को हाईकोर्ट जबलपुर में कोई तवज्जो नहीं मिली। हाईकोर्ट में कराधान घोटाले के विषय में उक्त आरोपियों के द्वारा लगाई गई याचिकाओं में अधिवक्ता संजय पांडेय के द्वारा कैबिएट और इंटरवेंशन फाइल की गई थी लेकिन इसके बावजूद भी हाईकोर्ट के जज के द्वारा इंटरवेंशन वाले पक्ष को सुना ही नहीं गया और न ही कोई बोलने का मौका दिया गया। अब जाहिर है यदि प्रशासन की पहले से ही मंशा पूरे मामले में लीपापोती की थी जिसका नतीजा यह हुआ कि गलत और भ्रामक जानकारी हाईकोर्ट में प्रस्तुत किया जाकर आरोपियों को क्लीन चिट दिलवाए जाने का षड्यंत्र किया गया। जिसका नतीजा हाईकोर्ट प्रकरण क्रमांक डब्लूपी 14826/2020 में पीडीएफ फाइल में अपलोड किया गया जजमेंट है।

आरोपियों के क्लीन चिट के विरुद्ध अब तक हाईकोर्ट में न तो प्रस्तुत हुई रिवीजन और न ही डबल बेंच याचिका

  कराधान घोटाले के मास्टरमाइंड राजेश सोनी एवं शिवशक्ति कंस्ट्रक्शन के प्रोपराइटर नागेंद्र सिंह एवं उनकी पुत्री प्रतिभा सिंह सहित लगभग आधा दर्जन पंचायतों को हाईकोर्ट से क्लीनचिट मिलने के बाद मामले पर शिकायतकर्ताओं के द्वारा रिवीजन और डबल बेंच में जाने के लिए प्रशासन से माग की गई। लेकिन अब तक न तो इसकी रिवीजन फाइल की गई है और न ही डबल बेंच में अपील की गई है। सवाल यह है की डबल बेंच में जाने के लिए लोकस स्टैंडी मात्र शासन पक्ष का ही रहेगा क्योंकि त्रुटिपूर्ण आदेश दिए जाने के बाद शिकायतकर्ता मामले पर अपनी तरफ से या कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को शिकायत करें अथवा अलग से याचिका दायर करें। कुछ जानकार वकीलों के अनुसार मामले पर डबल बेंच में शासन को ही जाना चाहिए लेकिन अब तक शासन के द्वारा न तो रिवीजन फाइल की गई है और न ही डबल बेंच में शासन अभी पहुंचा है।

लोकायुक्त भोपाल ने मामले पर लिया था संज्ञान पर सब हवा हवाई


  गौरतलब है कि लोकायुक्त प्रकरण क्रमांक 85/2020 में संज्ञान लेते हुए लोकायुक्त के द्वारा मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा जिला कलेक्टर रीवा एवं संभाग आयुक्त रीवा से पूछा गया था की हाईकोर्ट में शासन का पक्ष क्यों कमजोर किया गया और यदि किया गया तो इसकी अधिकारिता इन अधिकारियों को किसने दी थी? जिसके जवाब में मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा स्वप्निल वानखेडे ने लोकायुक्त पेशी दिनांक 19 दिसंबर 2022 को लोकायुक्त कार्यालय पहुंचकर अपना जवाब प्रस्तुत किया है। लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि आखिर पूरे मामले में लीपापोती करने और हाईकोर्ट को भी गुमराह करते हुए त्रुटिपूर्ण आदेश जारी करवाने के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या यह प्रशासनिक अधिकारी हैं जिन्होंने पूरे मामले पर प्रारंभ से ही लीपापोती करते हुए संभाग आयुक्त की संभागस्तरीय जांच को नजरअंदाज करते हुए मामले में वसूली और एफ 

आईआर की कार्यवाही करवाने के बजाय आरोपियों को पर्याप्त समय देकर अपूर्ण गुणवत्ताविहीन कार्य करवाने और मामले पर लीपापोती करने का पर्याप्त मौका दिया या फिर उन शासकीय अधिवक्ताओं के ऊपर कार्यवाही होनी चाहिए जिनके द्वारा पूरे मामले पर सही पक्ष हाईकोर्ट जज के समक्ष न रखते हुए गलत जानकारी प्रेषित की गई जिसकी वजह से आरोपियों को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच से क्लीन चिट मिल गई??

जब लोकायुक्त की जांच प्रक्रियाधीन थी तो हाईकोर्ट से कैसे मिल गई क्लीनचिट?

  गौरतलब है कि दिनांक 21/04/2022 एवं दिनांक 17/05/2022 को जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी स्वप्निल वानखेड़े के द्वारा विधिक सलाहकार लोकायुक्त आरके गौतम को भेजे गए लोकायुक्त प्रकरण क्रमांक 85/2020 मामले में अपने जवाब में सीईओ जिला पंचायत रीवा द्वारा वही जांच प्रतिवेदन दिया गया जो अतिरिक्त सीईओ जिला पंचायत रीवा एबी खरे एवं सहायक संचालक पंचायत विभाग जिला पंचायत रीवा आरके सिंह के द्वारा बनाया गया फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों से तैयार किया गया जांच प्रतिवेदन था जिसे औपचारिक तौर पर सीईओ जिला पंचायत स्वप्निल वानखेड़े के द्वारा लोकायुक्त संगठन को भी फॉरवर्ड कर दिया गया था। यहां पर विशेष तौर पर यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस जांच टीम में मात्र उपरोक्त दो अधिकारी नहीं बल्कि गंगेव जनपद के सहायक लेखा अधिकारी मंगला तिवारी को भी रखा जाकर कुल 3 सदस्यीय जांच दल था परंतु फर्जी जांच प्रतिवेदन तैयार किए जाने के कारण मंगला तिवारी द्वारा अंतिम जांच प्रतिवेदन में अपने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया गया था। सवाल यह है कि जब तक तीनों जांच अधिकारियों के हस्ताक्षर जांच रिपोर्ट में नहीं होंगे तो ऐसी जांच रिपोर्ट कैसे मान्य हो सकती है? और फिर हाई कोर्ट को गुमराह करते हुए कैसे आधा अधूरा फर्जी जांच प्रतिवेदन दिया जाकर आरोपियों को क्लीन चिट दिलवाई जा सकती है? इन दोनों जांच प्रतिवेदनो में लगभग 2 दर्जन पंचायतों सहित राजेश सोनी को वसूली से विमुक्त किया गया। यह वही याचिकाएं थीं जो 2 दर्जन से अधिक संबंधित ग्राम पंचायतों के सरपंचों द्वारा लगाई गई थी और साथ में निलंबित लिपिक राजेश सोनी की याचिका क्रमांक डब्ल्यूपी 14826/2020 दर्ज थीं जिसमें सीईओ द्वारा कहा गया की चूंकि प्रकरण उच्च न्यायालय जबलपुर में विचाराधीन है इसलिए जांच में कोई अंतिम निष्कर्ष निकाला नहीं जा सकता। अब सवाल यह था की यही दोनों जांच प्रतिवेदन दिनांक 21/04/2022 एवं 17/05/2022 को उच्च न्यायालय जबलपुर में भी राजेश सोनी और संबंधित सरपंचों द्वारा लगाई गई याचिका के जवाब में भी दायर किया गया था जिसके आधार पर संबंधित 22 पंचायतों को सीईओ जिला पंचायत के द्वारा वसूली की कार्यवाही से मुक्त करने के बाद उसी को आधार बनाकर उच्च न्यायालय जबलपुर की एकल पीठ ने राजेश सोनी सहित संबंधित याचिकाकर्ताओं को क्लीन चिट दे दिया है। इस क्लीन चिट में किसी भी प्रकार उक्त लोकायुक्त को भेजे गए दोनों प्रकरणों के विषय में लोकायुक्त का कोई पक्ष हाईकोर्ट ने पूछना उचित नहीं समझा। परंतु हाईकोर्ट को गुमराह करते हुए प्रशासनिक अधिकारियों और शासकीय अधिवक्ताओं ने इस मामले से संबंधित मनगवा थाने में दर्ज एफआईआर क्रमांक 470/2020 पर खात्मा बताकर हाईकोर्ट से आरोपियों को क्लीनचिट दिलवा दी। यहां पर सबसे बड़ी बात यह थी कि आखिर बिना खात्मा कैसे हाईकोर्ट से क्लीन चिट मिल गई और फिर जिस आधार पर जिस जांच प्रतिवेदन दिनांक 21/04/2022 एवं 17/05/2022 के आधार पर हाईकोर्ट ने मामले पर क्लीनचिट दिया वह जांच प्रतिवेदन सबसे पहले लोकायुक्त भोपाल को भेजे गए थे जिसमें लोकायुक्त एक बड़ी जांच एजेंसी थी जिसके विषय में हाईकोर्ट को स्वयं लोकायुक्त को नोटिस जारी करते हुए लोकायुक्त का भी पक्ष लिया जाना आवश्यक था लेकिन यहां पर ऐसा नहीं किया गया। इस प्रकार देखा जा सकता है कि इस सिंगल बेंच के आदेश में कई स्तर पर त्रुटियां हुई हैं जिन्हें सामान्य टाइपिंग त्रुटि तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता बल्कि गलत और भ्रामक जानकारी प्रदान करते हुए और शासकीय अधिवक्ता एवं प्रशासनिक पक्ष के द्वारा अपने ही केस को गलत ढंग से प्रस्तुत किए जाने के कारण हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के जजमेंट में इतनी भयंकर त्रुटि हुई है।

जिन कराधान घोटाले कि आरोपी पंचायतों को क्लीन चिट दी गई उनमें अभी भी बन रही है वसूली

  गौरतलब है कि पूरे मामले पर जिन 22 ग्राम पंचायतों को सीईओ जिला पंचायत रीवा स्वप्निल वानखेड़े के द्वारा क्लीनचिट देते हुए मामले का जबाब हाईकोर्ट जबलपुर में प्रस्तुत करवाया गया था उन 22 ग्राम पंचायतों में से 2 ग्राम पंचायत सेदहा एवं बांस में 14वें वित्त आयोग की परफॉर्मेंस ग्रांट की राशि से कराए गए निर्माण कार्यों की पुनः जांच के उपरांत लगभग 39 लाख रुपए की रिकवरी दोनों ही ग्राम पंचायतों में बनाई गई है। जिससे यह साबित होता है कि जिस जांच प्रतिवेदन के आधार पर मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा के द्वारा 22 ग्राम पंचायतों को निर्माण कार्यों की वसूली से मुक्त कराया जाकर हाईकोर्ट जबलपुर की सिंगल बेंच जजमेंट में क्लीन चिट दे दी गई उन ग्राम पंचायतों में कराधान योजना से कराए गए निर्माण कार्यों का गुणवत्ता परीक्षण किया ही नहीं गया बल्कि कार्यालय में बैठकर आंख मूंदकर मूल्यांकन करते हुए पूर्णता प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए। बड़ा सवाल यह है कि जब उसी 14वें वित्त आयोग की परफॉर्मेंस ग्रांट की राशि में वापस जांच के बाद गड़बड़ी पाई जा रही है तो इसमें दोषी कौन होगा? जाहिर है इसमें सबसे बड़ा दोषी तो वही होगा जो एक पोस्टमैन की तरह हाईकोर्ट जबलपुर में क्लीनचिट देने हेतु वसूली राशि निरस्त करने का प्रतिवेदन भेजा है।

 *जब आदेश क्रमांक 7503 पर जांच पूर्ण नहीं हुई तो किस आधार पर प्रशासन ने हाईकोर्ट में जवाब देकर आरोपियों को क्लीन चिट दिलवाई?*

   यहां पर एक बड़ा सवाल यह भी है के मामले की शिकायतकर्ता पूर्व जनपद उपाध्यक्ष संजय पांडेय एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा पूर्व के सीईओ जिला पंचायत अर्पित वर्मा के आदेश क्रमांक 6799 एवं 6771 की जांच टीम पर आपत्ति करते हुए मामले की जांच वापस उच्चस्तरीय और तकनीकी दृष्टि से सक्षम अधिकारियों के द्वारा करवाए जाने की मांग की गई थी। इसके बाद तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा श्री स्वप्निल वानखेड़े द्वारा पुनः पत्र क्रमांक 7503 जारी करते हुए पूरे मामले का भौतिक सत्यापन और वापस जांच किए जाने हेतु निर्देशित किया गया था। लेकिन जब पत्र क्रमांक 7503 पर जांच प्रतिवेदन आज दिनांक तक प्राप्त ही नहीं हुआ तो किस आधार पर आरोपी 22 पंचायतों को फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर क्लीनचिट दे दी गई? जिसके आधार पर बाद में भ्रामक गलत जवाब प्रस्तुत किए जाने के कारण हाईकोर्ट जबलपुर के एकल पीठ जज द्वारा आरोपियों के पक्ष में निर्णय लिया गया।

   *सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ और लोकायुक्त भोपाल में दर्जनों शिकायतों पर नहीं भेजे गए तथ्यात्मक प्रतिवेदन*

   गौरतलब है कि इसी मामले पर गंगेव जनपद की 38 एवं हनुमना जनपद की 25 ग्राम पंचायतों सहित पूरे मध्य प्रदेश की 1148 पंचायतों में लगभग 300 करोड़ के आसपास के 14वें वित्त आयोग की परफॉर्मेंस ग्रांट की जो राशि उक्त पंचायतों के सीधे एकल खाते में वर्ष 2019 में जारी की गई थी उसकी जांच के लिए आरटीआई से प्राप्त जानकारी और रीवा के परिपेक्ष में संभागायुक्त एवं जिला कलेक्टर के जांच प्रतिवेदन के आधार पर संपूर्ण 1148 पंचायतों में कराधान घोटाले, करारोपण नियमानुसार न कराया जाना और करारोपण की राशि का लोकल फंड ऑडिट न किया जाना, करारोपण की गलत नियम विरुद्ध प्रक्रिया, जिन वेंडर्स के खाते में कई पंचायतों की सीधे राशि बिना कार्य योजना और नियम विरुद्ध तरीके से अंतरित की गई आदि विषय में जांच किए जाने की मांग की गई थी। इस विषय पर न केवल एक या दो बल्कि दर्जनों शिकायतें लोकायुक्त भोपाल एवं आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ भोपाल में की गई हैं जिनको समय-समय पर विकास आयुक्त पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग एवं एडीशनल चीफ सेक्रेट्री पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग सहित जिला रीवा में जिला कलेक्टर जिला पंचायत सीईओ एवं संभागायुक्त को उच्च स्तर से बार-बार तथ्यात्मक प्रतिवेदन देने के लिए अंतरित किया जाता रहा है। लेकिन आज तक उक्त किसी भी शिकायत पर जांच नहीं हो पाई है और मामले को लिंगाराम किया जाता रहा है। 

  *सामाजिक कार्यकर्ताओं के आपत्ति के बाद सीईओ जिला पंचायत रीवा स्वप्निल वानखेड़े ने पंचायतराज संचालनालय एवं लोकायुक्त संगठन को लिखा था पत्र*

  कराधान घोटाले पर जब 22 पंचायतों को वसूली से विमुक्त करने और लगभग क्लीनचिट देने का मामला 2022 में ग्रीष्मकालीन और मानसूनी पंचायत चुनाव के पूर्व आचार संहिता के दौरान चल रहा था उसी समय सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के द्वारा मामले पर आपत्ति दर्ज की गई थी जिसके बाद मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा स्वप्निल वानखेड़े द्वारा संबंधित लोकायुक्त संगठन एवं साथ में आयुक्त पंचायतराज संचालनालय एवं निदेशक पंचायतराज संचालनालय सहित जिला कलेक्टर रीवा को पत्र लिखकर मामले की जांच उच्चस्तरीय एवं केंद्रीय एजेंसियों से करवाए जाने का पक्ष रखा गया था। इसी मामले में करारोपण की पात्रता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं जिसके लिए भी अलग से सीईओ जिला पंचायत रीवा द्वारा लोकायुक्त संगठन एवं पंचायतराज संचनालय को अलग से लिखा गया था। लेकिन इसके बावजूद भी बार-बार जांच उन्हीं आरोपी जनपद पंचायत के सीईओ जनपद पंचायत के अधिकारियों एवं जिला पंचायत रीवा में कार्यरत अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी एवं आरोपी लोगों के द्वारा की जा रही है जिनके ऊपर उक्त आर्थिक अपराध कारित किए जाने के आरोप हैं। तो अब बड़ा सवाल यह है कि जब आरोपी व्यक्ति को ही अपनी जांच करने के लिए कहा जाएगा तो वह भला क्या जांच करेगा? और जाहिर है ऐसे में वह अपने आप को हर बार दोषमुक्त करने के फर्जी और कूटरचित तरीके से दस्तावेजीकरण कर बचने का प्रयास करेगा। और इस मामले में बिल्कुल ऐसा ही हुआ है और उन्हीं आरोपियों का पक्ष समर्थन बार-बार किया गया जिनके ऊपर कराधान घोटाले के व्यापक आरोप लगे हुए हैं।

  *गंगेव जनपद की 38 में 11 पंचायतों के कराधान घोटाले की अब तक नहीं हुई जांच*

   गंगेव जनपद के 38 ग्राम पंचायतों में कराधान करारोपण घोटाले की शिकायत पूर्व जनपद उपाध्यक्ष संजय पांडेय एवं शिवानंद द्विवेदी द्वारा की गई थी। जिनमें 27 ग्राम पंचायतों को लेकर तो जांच प्रतिवेदन संभागीय टीम के द्वारा दिया गया था परंतु शेष 11 पंचायतों के द्वारा 14वें वित्त आयोग की परफॉर्मेंस ग्रांट से कराए गए निर्माण कार्यों में व्यापक अनियमितता की जांच आज दिनांक तक पूर्ण नहीं हो पाई है। वैसे मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा स्वप्निल वानखेड़े द्वारा हाईकोर्ट जबलपुर में मात्र 22 ग्राम पंचायतों की वसूली संबंधी राशि मुक्त किए जाने का ही जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया था जबकि उन्हीं 27 में शेष 5 ग्राम पंचायतों के विषय में जांच रिपोर्ट आज दिनांक तक प्राप्त नहीं हो सकी है। हालाकी मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा द्वारा कराई जा रही ऐसी समस्त जांच जो पहले ही संभाग आयुक्त द्वारा गठित संभागीय टीम द्वारा कराई जा चुकी है और जिसमें संबंधित पंचायतों एवं निलंबित लिपिक राजेश सोनी को दोषी पाया जा चुका है उन सभी जांचों को वापस सीईओ जिला पंचायत रीवा के द्वारा करवाए जाने का बार-बार संजय पांडेय एवं शिवानंद द्विवेदी दोनो द्वारा विरोध किया गया है और इसके विरुद्ध बार-बार वरिष्ठ कार्यालयों को लेख किया गया है। 

     सवाल यह है कि जब एक बार संभाग स्तरीय जांच हो गई और दोष सिद्ध पाया गया तो फिर बार-बार मात्र लीपापोती करने के उद्देश्य से जांच करवाए जाने का कोई औचित्य नहीं है। यहां पर मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा द्वारा बार-बार जो कृत्य किया जा रहा है वह अपनी अधिकारिता क्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए अवैधानिक और नियम विरुद्ध तरीके से किया जा रहा है जिसमें दोषी पाई गई पंचायतों को गलत तरीके से दोषमुक्त किया जा रहा है। भारतीय दंड संहिता में यदि किसी चोर अथवा डकैत द्वारा लूट कर ली गई है तो लूट की राशि वापस नहीं कराई जाती है और लुटेरों को दोष मुक्त नहीं किया जाता बल्कि लूट की राशि जब्त किए जाकर लुटेरों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया जाता है। लेकिन यहां पर भारतीय संविधान और भारतीय दंड संहिता के बिल्कुल विपरीत किया जा रहा है जिसमें एक बार लूट के आरोपी पाए गए सरपंच सचिव एवं संबंधित निलंबित राजेश सोनी को अब दोषमुक्त किए जाने का प्रयास किया जा रहा है जो पूरी तरह से नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है।

   शेष 11 पंचायतों की जांच भी पंचायत विभाग से हटकर प्रदेश स्तरीय बहुविभागीय तकनीकी जांच दल से करवाए जाने की मांग

तत्कालीन संभागायुक्त अशोक भार्गव द्वारा गठित संभाग स्तरीय जांच दल में कराधान घोटाले में फंसी गंगेव जनपद की 38 ग्राम पंचायतों में से जिन 27 ग्राम पंचायतों ने राशि का आहरण वंडर्स के खाते में एकमुश्त किया था और बिना कार्ययोजना के ही राशि गबन की थी वह जांच में दोषी पाई गई थी। परंतु शेष 11 पंचायतों की राशि उस समय पंचायतों के खाते में उपलब्ध थी जिसकी करारोपण की पात्रता से संबंधित जांच तो कभी नहीं हो पाई लेकिन उस राशि का भी दुरुपयोग उन 11 पंचायतों द्वारा बाद में कर लिया गया जिसमें फर्जी तरीके से कार्ययोजना बनाकर गलत मूल्यांकन और पूर्णता प्रमाण पत्र जारी करवाते हुए राशि आहरण कर लिया गया। जो कार्य उक्त 11 पंचायतों द्वारा करवाए गए वह कार्य भी अमानक स्तर के गुणवत्ताविहीन हैं जिसकी जांच किए जाने की माग शिकायतकर्ताओं द्वारा उच्च स्तर से की गई है जिसमें पंचायत विभाग से हटकर प्रदेश स्तर की बहुविभागीय एवं तकनीकी दृष्टि से सुसज्जित जांच दल द्वारा किया जाना आवेदित किया गया है। इस विषय पर लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ को भी लेख किया जाकर उनके स्तर से समस्त रिकॉर्ड जप्त किया जाकर जांच करवाए जाने की मांग की गई है।

  आम आदमी का न्यायपालिका से उठता विश्वास, देश के न्यायालयों में 5 करोड़ के लगभग पेंडिंग केस

आज सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट सहित देश की निचली अदालतों के पेंडिंग प्रकरणों को देखा जाए तो ताजा जानकारी के अनुसार लगभग 5 करोड के आसपास केस लगे हुए हैं जिनका अभी तक निराकरण नहीं हुआ है। पिछले वर्ष इन पेंडिंग केस की संख्या साढ़े 4 करोड़ के आसपास थी। अब जाहिर है जिस गति से विचाराधीन प्रकरणों की संख्या बढ़ती जा रही है ऐसे में आम आदमी के लिए अब न्यायपालिका का कोई औचित्य नहीं रह जाता। न्याय मात्र सक्षम और पैसे वाले लोगों की कठपुतली बन कर रह गई है। यदि कोई शिकायतकर्ता शिकायत कर और सूचना के अधिकार से जानकारी प्राप्त कर प्रशासनिक भ्रष्टाचार उजागर करता है और किसी भी प्रकार से कार्यवाही की अपेक्षा करता है तो प्रशासन स्वयं अपनी संलिप्तता के चलते आरोपी/लोकसेवक को बचाते हुए हाईकोर्ट तक में गलत और भ्रामक जानकारी प्रस्तुत कर क्लीनचिट दिलवाने में मदद कर रहा है। अब जाहिर है ऐसे में कोई व्यक्ति न्यायपालिका पर विश्वास करें तो किस आधार पर करें? पहले जब कभी प्रशासनिक कार्यवाहियां नहीं होती थी तो लोग कहते थे कि वह हाईकोर्ट जाकर न्याय प्राप्त करेंगे लेकिन आज जिस प्रकार हाईकोर्ट के निर्णय आ रहे हैं जिनमें इतनी बड़ी त्रुटि सामने आ जाती है ऐसे में किस पर विश्वास किया जाए? यदि सामान्य टाइपिंग मिस्टेक हो तो कोई बात नहीं लेकिन यदि इतना बड़ा जजमेंट ही इस आधार पर दे दिया जाए जो आधार ही निराधार हो ऐसे में स्वाभाविक तौर पर आम जनता का भारतीय न्याय प्रणाली से विश्वास उठ जाएगा।

   कराधान घोटाला मध्य प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में एक ऐसा घोटाला है जिसमें न्यायपालिका से भी उम्मीद टूट गई है। अभी इस प्रकार के मामले पर आगे क्या किया जाए यह अपने आप में विचारणीय है।





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